हंसत खेलत जिनिगी जियान हो गइल
हंसत खेलत जिनगी जियान हो गइल
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जब से ओकर नैना चार हो गइल
तब से उ गजल के किताब हो गइल!
कइलस कुछवू , कुछ अउरी हो गइल
मन खुश रहल दिल में बहार हो गइल!
ओके बुझइबे ना कइल का हो गइल
हंसत खेलत जिनगी जियान हो गइल!
बतियावे अइसे कि पागल हो गइल
उ ना जनलस कि हीर-रांझा हो गइल !
जेतने कोशिश भुलाये के करत गइल
दुनिया के बुझाव कि पागल हो गइल!
इश्क क ओकरा बड़ बेमारी हो गइल
बुझाव अंतरिक्ष के सवारी हो गइल!
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रचना स्वरचित,मौलिक
@सर्वाधिकार सुरक्षित
भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश
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