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मेरे शुष्क सज़ल नयन में तुम -------------------------- मेरे अन्तस में बसे हो तुम, ध्यान से अन्तर्ध्यान, जहां भी देखूं तुम ही तुम हो तुम्हें लगता है कि तुम ही हो, तो देख अपना अक्स, मेरे तो अक्स भी हो तुम्ही हो मेरे ख्वाब ख्याल में बसे तुम, संधान या परिधान, मेरे लिए संस्कृति हो तुम! मेरे कंठ उर के सृजन तुम, मोह कहो या विछोह, प्रेम के अमृत स्रोत तुम्ही हो ! मेरे शुष्क सजल नयन में तुम, झील कहो या सागर, मेरे नयनाभिराम हो तुम! अनचाहे मेरे चाह हो तुम, इकरार व इंतजार, मेरे जीवन के संसार तुम! रेगिस्तान में ओसिस तुम्ही हो, मूल कहो या क्षेपक, मेरी दुनिया जहान हो तुम! मेरे अतुलित आधार भी तुम, मूक रहूं या वाचाल, मेरे जीवन की पतवार तुम! मेरे तिमिर तम के उजास तुम, निर्गुण कहो या सगुण, जीवन के एहसास हो तुम!           -------------- राम बहादुर राय भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश
पहिले से  ढ़ेर  छिछोरा  हो गइल बा आदमी -------------------------------------- एक  दूसरा  के गलती  देख  रहल बा आदमी छेद के आपन छत से सहेज रहल बा आदमी। घूम रहल बाटे  बेल पर उहो कुछे दिन खातिर जेल में अनका के फंसा रहल बा अब आदमी। आगे  बढ़ि  गइल बाटे  अवकात से ढ़ेर अपने गिरावे खातिर  के खेला कर रहल बा आदमी। कहेला लोग  कि  बदल गइल बाटे ई जमाना पहिले  से ढ़ेर  छिछोरा  हो गइल बा आदमी। जहंवा देखऽ जात जाति खूब चल रहल बाटे अनका के छिमानू अब कर रहल बा आदमी। एंड़ी से कपार  तक भरल बाटे जहर सांप के मुंह धइके गरदन खूब काट रहल बा आदमी। के आपन के आन हऽ बन गइल बाटे पहेली ज़हरे में मिला के मधु बांट रहल बा आदमी। बोलबऽ  कुछवू तऽ बात बिगड़ी राम बहादुर सावधान! आदमी के काट रहल बा आदमी। आगे बढ़े  के बाटे तऽ  चुपचाप रहल जाला जे आदमी नइखे उहो बन रहल बा आदमी‌। ई मति  जनिहऽ  लगाव तोहरा से केहू के बा करे खातिर जबह खूब चढ़ा रहल बा आदमी।                     ------------------ राम बहादुर राय भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश
होई गइल बाड़े अदिमी अब तऽ समसान हो -------------------------------------- तोहरे कारनवा भइनी बन के फिफिहिया हम छूटि गइल हमरो अब तऽ जिये के आधार हो‌। संगी संहाति छूटल गॉंव घर के थाती छूटल अरे छूटि गइल आमवा महुइया के बाग हो। छूटि गइल......... माई बाबू छूटि गइलन खेत खरिहान छूटल अरे छूटि गइले ममता के हमरो बागान हो। छूटि गइल........ दूई कोठरी के चोंचला में गुजर करत बानी बूझि नाहीं पाइले कब होखे रात बिहान हो। छूटि गइल ....... नइखे पूछवइया केहू मुवलऽ की जियलऽ तूं होई गइल बाड़े अदिमी अब तऽ समसान हो। छूटि गइल..... केतनो हम जरीं मरीं साख तोहार भरे नाहीं तबो कहेलू बानी हम जीव के जंजाल हो। छूटि गइल........... कहे राम बहादुर सुनऽ नइख‌ऽ अकेले तूहीं बाटे चलल अब तऽ दुनिया में इहे रिवाज हो। छूटि गइल........              ------------------- राम बहादुर राय भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश
बांध सकोगे कब तक सूरज को अंधेरों से ------------------------------------ छोड़ दिया है आजमाना दोस्तों को मैंने भाग जाते हैं सभी,संकट में मुझे देखकर। घबरा से गये हैं अभी से देखकर मुझको उड़ गयी है नींद,मेरा आगाज़ देखकर। तुम्हारा अंदाजे बयां भी मैं समझता हूं होश़ फ़ाख्ता हैं तेरे,खुशी मेरी देखकर। सदियों से कहते रहे हो शोषित-वंचित मुझे कसते हो फब्तियां अब भी तुम,मुझे देखकर। लद गये वो ज़माने कि थे राजा बाबू तुम वक्त है बदल जाओ इस ज़माने को देखकर। आंकना वश में तेरे नहीं राम बहादुर को हुनर सीख गया है वो तेरा उसूल देखकर। तुम चल भी नहीं सकते,वह दौड़ने लगा है तेरा कटना बता रहा है,जलते हो देखकर। बांध सकोगे कब तक सूरज को अंधेरों से कौन टिका है सूरज की किरणों को देखकर। मंजूर थी तुम्हारी नाफरमानियां भी मुझे कह देते जो कहना था मुझको तुम देखकर। फक्कड़ राम बहादुर का क्या बिगाड़ सकोगे जो खुद चलता है सूरज की रौशनी देखकर।                  ----------------- राम बहादुर राय भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश
लगे रहो दिन रात तुम,सहकर के संताप ----------------------------------- दुनिया की यह रीति है,रोके चलती राह घर उजाड़े बसा हुआ,झूठे करती आह। जिसका हो बैरी नहीं, उससे सबको बैर अगर आदमी सच्चा है,लगता सबको गैर। पहले से मौजूद है,पूरी चादर तान अगर तुम बढ़ना चाहो,मानेगा अपमान। वश में तेरे नहीं है ,सबके हैं भगवान कुछ नहीं कर सकते हो,समय ही बलवान। कर नहीं सकते हो तुम,अपने बल पर बात कहते हो राधेय तुम,लाते कुल की बात। नहीं रोक सकोगे तुम,रवि को देकर हाथ टिका कब है अंधेरा,जब सूरज हो साथ। लगाकर बैठे कौरव,लाक्षागृह की आग साथ केशव हैं जिसके,बुझ जायेगी आग। राम बहादुर जानिये,चलना है चुपचाप लगे रहो दिन रात तुम,सहकर के संताप।                   ---------------- राम बहादुर राय भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश

समय पर काम न आये वो यार नहीं होते

समय पर काम न आये वो यार नहीं होते ------------------------------------ तलबगार बने हैं जो मददगार नहीं होते समय पर काम न आये वह यार नहीं होते। जिंदगी की जद्दोजहद में देखा है हमने जो होना है उस पर अख्तियार नहीं होते। हर इल्म का आइना हाथों में है अपने लगा लेने से क्रीम चेहरे साफ नहीं होते। सोच समझकर बोलना भाई राम बहादुर चलाये बाण और शब्द वापस नहीं होते। वक्त सबका आता है एक दिन ऐ साहब किये गये सार्थक प्रयास बेकार नहीं होते। भ्रम दूर करो सिकन्दर से डर जायेंगें हम कोई सिकन्दर हमसे यहां पार नहीं होते। अभी तो सीख रहे हैं कलम चलाने हम चुप रहते हैं जो कभी कमजोर नहीं होते। शापित कर्ण को तो मार पाओगे धोखे से छल से जीतने वाले कभी वीर नहीं होते। --------------- राम बहादुर राय भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश

बिका रहल बा आदमी बेकहल जज्बात पर

‌बिका रहल बा आदमी,बेकहल जज्बात पर ------------------------------------- चल रहल बाटे जिनगी,अनका अंजोर पर आपन वजूद नइखे,बा अनका जोर पर। अवकात देखा देलन,तनि तनि से बात में देखे से नीक बाड़न,अड़कसु ना बात पर। बात करबऽ उनका से,धौंस देखावेलन जेकर उधार जिनगी,चलता सेंगरा पर। चलावसु हिटलरसाही,मिले केहू उनसे खानदान बघारेलन,हर बात के बात पर। लिखे के नीक लिखेलन,संपादन करेलन कुछ पूछि देबऽ उनसे,आ जालें जात पर। देखिके पउवा भारी,सम्बन्ध बनावेलन सुनेलन राम बहादुर ,ताना हर बात पर। रेखा खीचले बाड़न,राखबि केकरा के केतनो रहबऽ नीमन,छांट देब जात पर। कहेलन राम बहादुर,पाकले आम बाड़ऽ केतना दिन अलगइबऽ,बाड़ऽ तूं छांछ पर। पहिलहूं से रहल बा,अबो नइखे छूटल बिका रहल बा आदमी,बेकहल जज्बात पर -------------- राम बहादुर राय भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश