बैलगाड़ी अउरी गाड़ीवान
बैलगाड़ी अउरी गाड़ीवान -------------------------------- चलत रहल बैलगड़िया खिंचत रहे बरधा भइया मूदि के कान लोरकी गावत चले गाड़िवनवा। बाँस से बान्हल रहल रहे सगरो बैलगड़िया लकड़ी के पहिया बन्हले रहे लोहा के बनिया। घाम बरखा होखे ओढ़त रहे जूट के बोरिया बरधन के माने लोगवा जइसे आपन बबुववा। भरि-भरि गाड़ी लादत रहल बोरा मोटिहवा मचर-मचर करे टसमस ना होखे बैलगड़िया। बोरा के बोझा से पलहथत रहे कबो गड़िया आगे गड़िवनवा रोके पीछे रोके सिपवुवा। लिट्टी-भवुरी लेके भूसा खरी रहे लटकवले रात-दिन हाँकत बैलगाड़ी मजूर के बेटउवा। कबो सुतत कबो जागत होखे राति-भोरहरिया जुएठ में नाधल बरधा के बजावत चले घनटिया। जेठ के झंझाइल लुक मारत रहे जब पछिमवा पगरी बान्हि के बइठल रहे गाड़ीवान पयनवा। मिले ना मोका सानत रहे गमछी में सतुववा सतुवा के पिड़िया संगवे खात रहले पियजिया। पेट कारन राति भर चलत रहल गाड़ीवानवा मिलत रहे दूगो पइसा चले घरवा के कामवा। अपने पहिने मोटिया मरकीन कहाव मलिकरवा जिनगी ठेठावत बीते रहल ना दूसर आसरवा। एगो कमात रहले दरजन भर रहले खनिहरवा पढ़ल ना रहे अदिमी धूर्तई जइसन ककहरवा। मरदा बरधा ढोवत रहले रीत-प्रीत गगरिया अद...