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समय पर काम न आये वो यार नहीं होते

समय पर काम न आये वो यार नहीं होते ------------------------------------ तलबगार बने हैं जो मददगार नहीं होते समय पर काम न आये वह यार नहीं होते। जिंदगी की जद्दोजहद में देखा है हमने जो होना है उस पर अख्तियार नहीं होते। हर इल्म का आइना हाथों में है अपने लगा लेने से क्रीम चेहरे साफ नहीं होते। सोच समझकर बोलना भाई राम बहादुर चलाये बाण और शब्द वापस नहीं होते। वक्त सबका आता है एक दिन ऐ साहब किये गये सार्थक प्रयास बेकार नहीं होते। भ्रम दूर करो सिकन्दर से डर जायेंगें हम कोई सिकन्दर हमसे यहां पार नहीं होते। अभी तो सीख रहे हैं कलम चलाने हम चुप रहते हैं जो कभी कमजोर नहीं होते। शापित कर्ण को तो मार पाओगे धोखे से छल से जीतने वाले कभी वीर नहीं होते। --------------- राम बहादुर राय भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश

बिका रहल बा आदमी बेकहल जज्बात पर

‌बिका रहल बा आदमी,बेकहल जज्बात पर ------------------------------------- चल रहल बाटे जिनगी,अनका अंजोर पर आपन वजूद नइखे,बा अनका जोर पर। अवकात देखा देलन,तनि तनि से बात में देखे से नीक बाड़न,अड़कसु ना बात पर। बात करबऽ उनका से,धौंस देखावेलन जेकर उधार जिनगी,चलता सेंगरा पर। चलावसु हिटलरसाही,मिले केहू उनसे खानदान बघारेलन,हर बात के बात पर। लिखे के नीक लिखेलन,संपादन करेलन कुछ पूछि देबऽ उनसे,आ जालें जात पर। देखिके पउवा भारी,सम्बन्ध बनावेलन सुनेलन राम बहादुर ,ताना हर बात पर। रेखा खीचले बाड़न,राखबि केकरा के केतनो रहबऽ नीमन,छांट देब जात पर। कहेलन राम बहादुर,पाकले आम बाड़ऽ केतना दिन अलगइबऽ,बाड़ऽ तूं छांछ पर। पहिलहूं से रहल बा,अबो नइखे छूटल बिका रहल बा आदमी,बेकहल जज्बात पर -------------- राम बहादुर राय भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश

कलयुग में कान्हा कपटी कंस कराल बा

कलयुग में कान्हा कपटी कंस कराल बा अनेकन कंस के मुंह भइल बिकराल बा। कागासुर बकासुर बानिंजा हमनिये के पुतना उतना के भरल पुरल परिवार बा। गीता भगवदगीता के पाठ सब करता पढ़ लिख के मनवा भइल महाभारत बा। संकट में धर्मसंकट अचरज में हो गइलें शकुनी दु:सासन से पटल अब गॉंव बा। राष्ट्र धृतराष्ट्रन से अब तरई छवाई गइल द्रोण भीषम करन के योग मंत्र कहां बा। कान्ह जनमलऽ माधव से छलिया बनऽ सब केहू एहघरी बनल  भगवाने बा। मामा शकुनि कंस महाभारत करवलस घर घरे में शकुनि जरासंध से भरल बा। जातिवाद क्षेत्रवाद अब तऽ चरम पर बा जातिये से तऽ भइया योग्यता भरल बा। आवऽ केशव बरबरिक के जियावऽ अब इहंवा डेगे  डेग महाभारत  हो रहल बा। मारा मारी लुटहंस इहंवा खूबे मचल बा राम बहादुर के बस कान्हा के अलम बा।               -------------- राम बहादुर राय भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश।

जो दिखता भरा वह खाली है

जो दिखता भरा वह खाली है ------------------------- दुनिया ये कैसी निराली है जो दिखता भरा वह खाली है। अजब-गजब होते कारनामे जो असली है वही जाली है। मौज उड़ाते साली के संग कहता है गलत घरवाली है। करता काम यहां दूसरा है बनता और कोई माली है। कहता है बहुत प्रदूषण है जलाता स्वयं ही पराली है। बैठकर झूठ की गंठरी पर दे रहा सच को वह गाली है। गरीबी उन्मूलन के नाम पर छीनता गरीब की थाली है। बहुरेंगे कब हमारे भी दिन पूछ दो तो कहें बवाली है। -------- राम बहादुर राय

वीर तभी धनंजय हैं जब हों माधव साथ

वीर तभी धनंजय हैं,जब हों माधव साथ ----------------------------------- बोली तो अनमोल है,बोलना अच्छे बोल नहीं बोल सकते अच्छे,ज़हर तूं मत घोल। चल रही है होड़ यहां, है किसका प्रताप रखते थे हाथी सभी,मुंह से बनते बाप। होते हैं दरिद्र लोग,करे बड़ाई आप दो पैसे जब आ गये,देते सबको नाप। बड़ा मतलब होता है,रहो धीर गंभीर लेता काम संयम से,होता नहीं अधीर। देखोगे उस पेंड़ को,आता सबके काम झुक जाता है अदब से,नहीं बताता नाम। दुनिया तो दिखावा है,पूजती लम्बी बांह जो होता कमजोर है,देती नहीं पनाह। मत पालना भ्रम कभी,हो सबसे तुम वीर पता चलेगी अवकात,उठा कभी शमशीर। वीर तभी धनंजय हैं,जब हों माधव साथ लड़कर अकेले देखना,उड़ जायेगा माथ। ----------------- राम बहादुर राय भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश

बैठे हैं जाल बिछाये चारों तरफ शिकारी

बैठे हैं जाल बिछाये चारों तरफ शिकारी कौन फंसाये कितना कर रहे मारा मारी। जिसे देखते मालधनी माया वहीं फैलाते बनकर मासूम लोगों को लेते छीन क्यारी। पिला देते हैं ज़हर को बताके शहद मीठा समझ नहीं पाता है कोई इनकी अय्यारी। रोते  हैं  घर में अपने  मृदंग  बजाते बाहर प्रेम  सुधा  बरसाकर  चला  देते हैं आरी। करते  हैं  बात  ऐसे   जैसे  हों  महाज्ञानी बढ़ता देख किसी को चलाते छुरी कटारी। वक्त के  हिसाब से बदलते  रहते हैं चोला प्यार जतायें जिसपे नुकसान करेंगे भारी। दिखावे का रहता है चेहरा मासूम इनका पलक झपकते बेच देंगे नहीं देखते यारी। सावधान!बचके रहना होगा राम बहादुर जलने की होती है अदृश्य जैसी बीमारी।                  -------------- राम बहादुर राय भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश

निश्छल प्रेम मिलता है आज भी गॉंवों में

निश्छल प्रेम मिलता है आज भी गॉंवों में ------------------------------------ हम तो रहते हैं गॉंव की गलियों गलियों में झरती खुशबू डाली डाली और कलियों में। पक्षी करते कलरव भौंरे गुनगुन गाते हैं जहां सुनाती लोरी नदियां गॉंवों गॉंवों में। रुनझुन से पशुओं के होता रोज सबेरा जहां हैं रहते पूर्वज पीपल के पेड़ों में। राग सुनाती कोयल काग देता शुभ सन्देश रिश्तों से भरा है मोती इस भारत देश में। दुख कभी आ जाये तो लेते हैं लोग बांट निश्छल प्रेम मिलता है आज भी गॉंवों में। होता है महादानी गॉंवों का हर किसान निस्पृह भाव से सेवा देता है गॉंवों में। लट बनाकर झूलती हैं सुनहरी बालियां कभी देखो उलझे प्रेम धान के खेतों में। बेकार समझते हैं जिसे दुनिया के लोग बिखरे हैं तरबूज हमारे रेगिस्तानों में। हीरे मोती पर ममता मां की भारी है होता है धरती पर स्वर्ग मां के आंचल में। नहीं खरीद सकते हो धन दौलत से सुख बहती हैं नदियां सुख की आ जाना गॉंव में। -------------- राम बहादुर राय भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश #highlight