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पास रहकर भी पास नहीं रह पाये‌ ----------------------------- हजार सपने सजाये बैठे थे  बोध के बांध नहीं पार कर पाये। जाते थे महफ़िल में रोज उनके  लेकिन इज़हार हम नहीं कर पाये। मानते थे जिनको हम ख़ुदा जैसे  शायद वो मुझे नहीं समझ पाये। दुश्वारियों में भी साथ रहे उनके  सपने साकार हम नहीं कर पाये। हमारी किस्मत भी कुछ ऐसी है  पास रहकर भी पास नहीं रह पाये‌। तुम नाज़ुक मिज़ाज हो राम बहादुर  फ़रेबी दुनिया को नहीं समझ पाये। यह दुनिया मतलबी बहुत होती है  लेकिन मतलबी तुम नहीं बन पाये। सपना साकार हो सकता है अब भी खाकर धोखा अब भी संभल पाये।                    ------------- राम बहादुर राय  भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश #highlightseveryone
32-किया था शिशुपाल मैं वही कर रहा हूं! ------------------------------------ पानी पर पानी से पानी लिख रहा हूँ लोगों की कहानी जुबानी लिख रहा हूं। कोई बढ़ ना पाये ऐसा मैं चाहता हूं प्रतिष्ठा मैं अपनी ही धूमिल कर रहा हूँ। कसता रहता हूँ लोगों पर मैं फ़ब्तियां फिर भी अपने को खानदानी कह रहा हूँ। मैं नहीं जानता हूं कि मैं क्या कर रहा हूँ जाने अनजाने में कुछ भी कर रहा हूँ। पर निन्दा है करना,खटिया बुनने जैसा खटिया गुनाह की मैं बुनता जा रहा हूँ। समझ रहा हूँ कि मैं चालाकी कर रहा हूँ चाल पुरानी पर खानदानी चल रहा हूँ। पत्थर फेंकने पर आयेगा ही लौटकर इस बात को नज़र अंदाज़ मैं कर रहा हूँ। वक्त संभलने का मिलता है राम बहादुर जो किया था शिशुपाल मैं वही कर रहा हूं।                 ------------------ राम बहादुर राय भरौली, बलिया, उत्तर प्रदेश
आछो आछो करी सब,रहबऽ ढ़ेर कमाते ----------------------------------- योग्य तबे तूं होखबऽ,रहबऽ जाति जमात आछो आछो करी सब,रहबऽ ढ़ेर कमात। रेप करऽ चाहे मडर,नइखे कवनो बात दोस ना देखब ओकर,चाहीं आपन जात। टेढ़ होखे भा बांगुच,नीक चाहे खराब कहब नीमन अपने के,चाहे पिये सराब। लड़िका बा हमार तऽ,गलती बाटे माफ पइसा फेकब एतना,बची बबुववा साफ। केतनो करऽ मजूरी,ठेठा लऽ जांगर पइसा कउड़ी रही तऽ,धिया पूत आगर। पूछी सबहर तोहके,रही हाथ में दाम रुपया पइसा ना रही,बिगरी बनलो काम। जवन जे विरोध करता,करत उहे बा काम अपना पर कुछ परत बा,मुंह हो जाता जाम। मचल रउराठ जाति के,बिगरत बा अब बात अटर पटर सब बोलता,नइखे कुछू बुझात। सुनऽ ए राम बहादुर,मति करिहऽ रउराठ  केकरा कुछ कहबऽ तूं,सुन के होखब काट।                      ------------- राम बहादुर राय भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश #highlightseveryone
भागता सब खेती से,जइसे लागल छूत ---------------------------------- भुला रहल बाटे लोग,आपन रीति रिवाज निकलत नइखे कहीं से,लोगन के आवाज। दूर सहर में बइठि के,देखत बा चुपचाप बेच रहल बाटे लोग,खेत खाप के खाप। बिसारल जा रहल बा, पहिले वाली बात बिसरत जा रहल बा,अब अंजोरिया रात। नर नेवान के पूछे,समहुत भइल अछूत भागता सब खेती से,जइसे लागल छूत। बिगहा एकड़ बेचि के,बनत बाटे फलैट नाता टूटल गॉंव से,अपने भइल फलैट। कुहुंकता बाग बगइचा,रोवत बा दालान चुल्ही में सब ढ़ूक गइल,रोवत बा खरिहान। सुनऽ ए राम बहादुर,छोड़िहऽ जनि गॉंव जी ना पइबऽ सहर में,गॉंवे करी उभांव। सहर से ललकारत बा,कइसे बाची गॉंव तूरि के गांव से रिश्ता,बचावता सब गाॅंव। देखले गाॅंव कबो ना,उहे लिखत बा गाॅंव जे गाॅंव जुड़ल बाटे,नइखे ओकर नॉंव।                    ---------------- राम बहादुर राय भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश
मिलना बिछड़ना तो चलता रहेगा  ----------------------------- मिलना बिछड़ना तो चलता रहेगा जो आज है कल नहीं वह रहेगा। काम अपना चाहिए करते रहना जो होना है वह होकर ही रहेगा। कौन कहता है जीत सकते नहीं मन से करोगे तो होकर रहेगा। अहं वहम को फेंकों तुम दरिया में जिसे ज्ञान होगा,झुककर रहेगा। करोगे अच्छा तो अच्छा ही होगा सिलसिला ऐसा तो चलता रहेगा। हरिश्चंद्र कोई बन सकता नहीं है बनेगा तभी जब सतयुग रहेगा। यह  संसार है मेला का झमेला आदमी अच्छा यहां कैसे रहेगा।                 ------------ राम बहादुर राय भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश
जी रहा हूं मैं बनकर के एक ज़िन्दा पीर ---------------------------------- मरने की मेरी जो तुम दुआ कर रहे हो सोच लेना यह कि तुम भ्रम में जी रहे हो। रोज मरता और जीता हूं सुबहो शाम मारने के लिए मुझे बेमौत मर रहे हो। ज़िन्दा देखकर मुझे इतना जो डर रहे हो ऐ ज़ालिम तुम भूल कितनी कर रहे हो। बन चुका हूं मैं कब का ख़ुद एक ज़नाजा सोचो कि तुम ज़नाजे से भी डर रहे हो। वश में रहता तुम्हारे उठा देते ज़नाजा तंग होकर मुझे मुझे तंग कर रहे हो। जी रहा हूं मैं बनकर के एक ज़िन्दा पीर देखकर क़फ़न मेरा क्यूं इतरा रहे हो। जहां मैं रहूंगा मुझे कोई दिक्कत नहीं शायद इसी बात से तुम मात खा रहे हो। मुझे देखकर देखते तुम चले जाओगे हमेशा से मुझे देखकर मरे जा रहे हो। तुम्हारी हस्ती नहीं जो मिटा दोगे मुझे मेरे चाहने से ही तुम चल पा रहे हो।                  -------------- राम बहादुर राय भरौली, बलिया, उत्तर प्रदेश
गुजारिश ख्वाहिश मेरी पूछ लो ---------------------------------------- पल भर में ही इरादा बदल लेते हो तुझे अपना बनाने से क्या फायदा! क्यों मिलते हो,जब फुर्सत नहीं मिलती ऐसे मिलने का तुझसे क्या फायदा! सिर से पांव तक हम यूं फ़ना हो गये तेरे कारण ही हम बेपनाह हो गये! है गुजारिश कि ख्वाहिश मेरी पूछ लो वर्ना इन ख्वाहिशों का है क्या फायदा! जब तेरे साथ थे वक्त भी साथ था बिन तेरे ये वक्त भी ठहर सा गया! निकलता नहीं है दिन में सूरज मेरा रात को तारे गिनने से क्या फायदा! तुम से ही अंधेरों में थी  रोशनी तुम नहीं तो ये दीपक भी ओझल हुए! मेरी क्या थी खता कि बदल तुम गये मैं न बदला, इससे है क्या फायदा! जिंदगी है मेरी, बुलबुला पानी का कब उठी,कब फूटी मुझे पता ही नहीं! मैं जिंदा हूं तो सिर्फ़ तेरी अज़मत लिए वर्ना,इस जीवन से है क्या फायदा! इस तरह से मुझमें अंकशायी हुए मेरे दिल में अब कोई जगह ही नहीं! तेरे इरादे बदलने का कुछ गम नहीं बिन तेरे किसी से है क्या फायदा!              ------------------ राम बहादुर राय भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश