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चलती है तेरी जिंदगी मेरे नाम से ---------------------------- पूछते वो नहीं मुझे शजर जानकर तोड़ते मोड़ते मुझे अपने हिसाब से। मैं सहता रहा उनके सभी ज़ुल्म को चुप कराते रहे वे अपने हिसाब से। लोग हंसते रहे मैं बिलखता रहा कर दिया दूर तुमने दैरो हरम से। हमें समझते शजर तो समझते रहो खड़ा था और रहूंगा खड़ा शौक से। मैंने झेला है चील और कौवों को चलती है तेरी जिंदगी मेरे नाम से। टूट जायेगा भ्रम तुम्हारा एक दिन बन जाऊंगा खंजर मैं ही शजर से। हर ज़ुल्म की होती है मुकर्रर सजा  पाओगे सजा तुम भी किये पाप से।                   ----------- राम बहादुर राय भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश #highlightseveryone
तीर्थ सभी मां-बाप हैं,सिर उनके चरण में रखना  ------------------------------------------ चाहे तुम गॉंव में रहना चाहे शहर में रहना पूंजी बाप दादा की संजोकर याद में रखना। बेचकर संस्कार बन रहे आधुनिक यहां के लोग जिस मां ने तुझको जन्म दिया उसे साथ में रखना। पढाई कोई भी करना मर्यादा याद तुम रखना अफ़सर बन गये कोई तो दिमाग गॉंव में रखना। रुठ जायें बहन-भाई तो मना लेना उन्हें तुम बचपन की प्यार भरी शरारतें याद में रखना। पढ़ते थे साथ जिनके तुम उनका सम्मान करना  चाहे कुछ भी करें वो साथी तुम प्यार में रहना। बड़ा होने का मतलब ये नहीं,हो गये बड़े तुम  टूट जायेगा भ्रम सिर मां के आंचल में रखना। चाहे तुम गॉंव में रहना चाहे शहर में रहना तीर्थ सभी मां-बाप हैं,सिर उनके चरण में रखना                       ----------------- राम बहादुर राय  भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश #highlightseveryone
38-मेरे ज़ख्मों से करता वह खुराफात है ------------------------------- क्या बताऊं हालात मेरे कैसे हैं कैसे कहें,कह नहीं सकते जो बात है। बिछाये बैठे हैं जाल जो सैय्याद हैं देखते दिन में ऐसे जैसे कि रात है। देते हैं दुआ मेरी वो नाकामी के भेड़िया होकर भी आदमी की जात है। जो भी करता हूं देखता चुपचाप है मेरे ज़ख्मों से करता वह खुराफात है। वो समझता है सबका वही मुकद्दर है तारे गिनने की दिन में ही आदत है। सहते-सहते ज़ख्म पर बेअसर ज़ख्म हैं डर होगा तुझे,हमें तो इसकी आदत है। जान लो होती है कयामत कभी न कभी देख लेना वहां किसकी कितनी ताक़त है।                  --------------- राम बहादुर राय भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश
#कुछ_खट्टे_कुछ_मीठे_तीखे_व्यंग्य  चांदी की चम्मच और सोने की थाली जिसके पास नहीं है कहते उसे जाली। पेंड़ लगाकर करता हरा भरा धरा को आता कोई बाहर से बन जाता माली। संजोकर रखता इमान कोई आदमी करता है दलाल ही इमान की दलाली। जहां देखो करता है मौज चोर-चाई मेहनत जो करता सुनता वह है गाली। करता है आजकल कमाई जो काली चेहरे पर उसके ही दिखती है लाली। खाता है कमाकर रोटी जो इमान की उसे देखकर बजाये बेइमान ताली। बांच रहे अंधे ही कविता हर मंच पर कवि लोग बजा रहे बैठकर के ताली। राम बहादुर छोड़ो, वश में नहीं तेरे लगे रहना,मेहनत जाती नहीं खाली।                    -------------- राम बहादुर राय  भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश #highlightseveryone
सुलझ जाते हैं मसले, संवाद होना चाहिए  ------------------------------------ बात जब बिगड़ जाय तो बात होनी चाहिए  बात बने या न बने,शुरुआत होनी चाहिए। चल रहा है दौर अब साज़िशों का बेहिसाब कर रहा है कौन यह बात समझनी चाहिए। बढ़ रही संख्या आजकल नक़ाब पोशों की बदल गया ज़माना,सूरत बदलनी चाहिए। हर पोशीदे के साथ चल रहा है आइना सूरत के साथ सीरत भी बदलनी चाहिए। घूम रही हैं मृग मरीचिकायें भेष बदलकर लगे प्यास तो सावधानी बरतनी चाहिए। विवाद हो मगर संवाद अति आवश्यक है सुलझ जाते हैं मसले,संवाद होना चाहिए। लड़ो झगड़ो चाहे ख़ून की नदियां बहा लो अन्त में होगा यही कि बात होनी चाहिये। चुपचाप तमाशा देखने से कुछ नहीं होगा  राम बहादुर को ही बात चलानी चाहिए।                   ---------------- राम बहादुर राय  भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश #highlightseveryone
पास रहकर भी पास नहीं रह पाये‌ ----------------------------- हजार सपने सजाये बैठे थे  बोध के बांध नहीं पार कर पाये। जाते थे महफ़िल में रोज उनके  लेकिन इज़हार हम नहीं कर पाये। मानते थे जिनको हम ख़ुदा जैसे  शायद वो मुझे नहीं समझ पाये। दुश्वारियों में भी साथ रहे उनके  सपने साकार हम नहीं कर पाये। हमारी किस्मत भी कुछ ऐसी है  पास रहकर भी पास नहीं रह पाये‌। तुम नाज़ुक मिज़ाज हो राम बहादुर  फ़रेबी दुनिया को नहीं समझ पाये। यह दुनिया मतलबी बहुत होती है  लेकिन मतलबी तुम नहीं बन पाये। सपना साकार हो सकता है अब भी खाकर धोखा अब भी संभल पाये।                    ------------- राम बहादुर राय  भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश #highlightseveryone
32-किया था शिशुपाल मैं वही कर रहा हूं! ------------------------------------ पानी पर पानी से पानी लिख रहा हूँ लोगों की कहानी जुबानी लिख रहा हूं। कोई बढ़ ना पाये ऐसा मैं चाहता हूं प्रतिष्ठा मैं अपनी ही धूमिल कर रहा हूँ। कसता रहता हूँ लोगों पर मैं फ़ब्तियां फिर भी अपने को खानदानी कह रहा हूँ। मैं नहीं जानता हूं कि मैं क्या कर रहा हूँ जाने अनजाने में कुछ भी कर रहा हूँ। पर निन्दा है करना,खटिया बुनने जैसा खटिया गुनाह की मैं बुनता जा रहा हूँ। समझ रहा हूँ कि मैं चालाकी कर रहा हूँ चाल पुरानी पर खानदानी चल रहा हूँ। पत्थर फेंकने पर आयेगा ही लौटकर इस बात को नज़र अंदाज़ मैं कर रहा हूँ। वक्त संभलने का मिलता है राम बहादुर जो किया था शिशुपाल मैं वही कर रहा हूं।                 ------------------ राम बहादुर राय भरौली, बलिया, उत्तर प्रदेश