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Showing posts from June, 2024

बहुते कठिन बाटे किसान के किसनिया

बहुते कठिन बाटे किसान के किसनिया ------------------------------------------------ खतम हो गइल बाटे बदरी के पनिया बहुते कठिन बाटे किसान के किसनिया। ताल-पोखर अपने छांहे में लुकाइल मरीचा अस घाम से देंह लहलियाइल। जोतलो खेत भइल भाला के नोखिया लहकत आगी में धधकत बा बेहनिया। खेती-बारी कइला से काम ना चले रसे-रस जवनिया फांका काटि के रहे। कबहूं बाढ़ि दाबे कबो दबलस सुखारो केतरे,कइसे करी किसानो किसनिया। सूखि-सूखि आमवा गिरत बा बवुराई जाने कवन चनरगत आगहूं भी आई। जाने कवना के जादू-टोना लागल सूरज देव के चढ़ले जाता जवनिया। देखते-देखत बदरी , आंखि पथराइल खेती त खेती अब जिनगियो हेराइल। का कहीं केतनो दुनिया के समझाईं भोगलो पर सुधारते नइखन रहनिया। पानी त पानी खत्म होता जिन्दगानी केतरे निबही किसानन के जिनगिया। खतम हो गइल बाटे बदरी के पनिया बहुते कठिन बाटे किसान के किसनिया। ------------------ राम बहादुर राय भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश @followers

चलऽ गंवुए मिलि अंचरा के छांव

चलऽ ! गंवुवे मिलि अंचरा के छांव!!! --------------------------------------------- छोड़ऽ नगर चलि चलऽ अपना गांव लागी ना गरमी मिली पिपर के छांव। अबो इहां बचल बाटे बाग बगइचा नेह-छोह के चिरई करे चांव-चांव। होते भोरहरिया जगावेले किरिनिया गंगा जी क पनिया में अमृत के गांव। गांवे हवा - पानी के बयार बहता दूध-दही-घीवो के उमड़े दरियाव। पाकल आम ठोरवा में  लेके भागे  सुगा,कउववा खोजत खाये के ठांव। तवकत  मृगडाह   में  डाढ़ा  लेसेला  घन बंसवरिया में मिले सीतल छांव। डह-डह डहकेलन  नगर के बेटवुवा कहे छोड़-छाड़ के चलऽ अबो गांव। चिरई-चुरूंग  के पानी रखल जाला घर-घर  चिरइया करेली खूब नहान।   कूदि-फानि के चिरई चुगेली अनाज  देखत रोटिया काग करे कांव-कांव।  गांवहीं लउकत  ताल-तलैया,पोखर सभ मिल गंगाजी के प्रीत में नहाव। एसी, पंखा ,कुलर  काम ना करेला जगहे-जगह फेंड़ कटे,सहर बनेला। पत्थरे  के घर  में  फूल धईल जाता  याद नइखे अपने पुरनियन के नांव। एहि से कहिला  छोड़ माया बाजार  चलऽ! गंवुवे मिलि अंचरा के छांव! अबो से कहतानी चलऽ अपन गांव  ई नीरस जिनगी कब ले  तूं जियबऽ  खेत-खरिहान आ बगइचा बचावऽ  फेंड़...

नयना से देखत,फूटेले किरिनिया

नयना से देखत ,फूटेले किरिनिया ----------------------------------------- हमरो बलमुवां के सांवरी सुरतिया देखेला पर बिहंसे मोहनी मुरतिया। चलेलन खोलिके कुरता के बटमिया धक-धक करे लागे हमरो पिरितिया। बड़ा लहरदार बाटे उनुकर अंखिया नयना से देखत , फूटेले किरिनिया। पातरे कमर , सेरवन नियन छतिया पनवा खाले तबो चमके बिजुरिया। फर-फर उड़ेला लमहरकी मोछिया मोछिये पर लटके हमरे जिनिगिया। हमरो बलमुवां के सुगा के नकिया ओठवा से चुवे नेहिया के पनिया। देवकुल लागसु जब बांधे पगरिया टिका बनावे कामदेव के सुरतिया। पान खात सैंया देख,ढ़हे सवतिया पाई के इनके जागल किसमतिया। जब-जब हमरा के देखि मुसुकालें होके जवान दवुरे हमरो उमिरिया। विसनु जी के पूजा करीं लरिकइयां तब मिलल बाड़ें बांका मोर संइया। पल-पल हमके बतावें सभे बतिया बड़ा सुख पाईं,छुवे नाहीं बिपतिया। -------------------- राम बहादुर राय भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश

भोजपुरी के मान्यता देबहीं के परी

भोजपुरी के मान्यता देबे के परी !!! ------------------------------------------ भोजपुरी भाषा के जनि ठेठावऽ हो भोजपुरिये पर आवे के परी! अपने में अलग-विलग न करावऽ हो अपने पर ही आवहीं के परी! चाहे बोलिहऽ हिन्दी चाहे अंग्रेजी हो भोजपुरी के अपनावे के परी! भाषा भोजपुरी हई आपन माई हो माई के कसहू लावे के परी! मान्यता भी कवनो सरकार देई हो सबका संगही आवे के परी! माई के बाड़न कई-कई ललनवा हो माई पर धियान देबे के परी! अपने भाई-बहिन सब केहू बाटे हो सबके गले से लगावे के परी! जगवा में सगरे बाड़ें भोजपुरिया हो सबकरा के जगावहीं के परी! चाहे कवनो बा केहू के धरमवा हो भोजपुरी भाषा बोले के परी! आपन-आपन सवारथ के छोड़ऽ हो बिना सवारथ के लड़ेके परी! तीर-तलवार,गोली के काम नइखे हो एकता रही त गोली का करी! जइसे कुंवर,मंगल लड़ाई लड़लन हो भोजपुरी खातिर उहे करे के परी! सन् सैंतालीस में आजादी मिलल हो सत्याग्रह,आन्दोलन करे के परी! भोजपुरी के मान्यता देईं ए सरकार ई कितबियो हमार पढ़े के परी! अब नाहीं सिहुर-सिहुर ,मेऊं होई हो सोटा-लंगोटा कसे के परी!!! केतना होई निहोरा, अब ना होई हो अब भगत,आजाद बने के परी!!! ...

झूठों की बारात खड़ी है

झूठों की बारात खड़ी है ---------------------------------- झूठों की बरात चली है हर जगह बाज़ार लगी है। कौन कितना झूठ बोलता है इसकी नहीं अवकात बनी है। सच का कहीं भी पता नहीं है झूठों से बाजार भरी है। झूठ के आंसू निकल रहे हैं मानो विपदा आन पड़ी है। हथियार की क्या जरूरत है झूठों की बारूद खड़ी है। सफलता के मानक बदले हैं सच के आगे झूठ बड़ी है। जो सच में काम कर रहा है उसके लिए मुसीबत खड़ी है। सच में कोई सच बतला दो फिर दुश्मनों की फ़ौज खड़ी है। सच के बादल उमड़ रहे हैं यहां झूठी बारिश पड़ी है। -------------- @राम बहादुर राय भरौली बलिया उत्तरप्रदेश

शब्द सोच समझकर लिखा जाय

शब्द सोच समझकर लिखा जाय ------------------------------------------ शब्द रचे जाते हैं , गढ़े जाते हैं शब्द मढ़े जाते हैं , लिखे जाते हैं। शब्द ही पढ़े और बोले जाते हैं शब्द तौले , टटोले , खंगाले जाते हैं। अन्ततः----- शब्द बनते हैं संवरते , सुधरते हैं शब्द निखरते , हंसाते , मनाते हैं। शब्द मुस्कुराते , खिलखिलाते हैं गुदगुदाते, मुखर, प्रखर , मधुर होते। किन्तु-------- शब्द मरते नहीं शब्द थकते नहीं शब्द रूकते नहीं शब्द चुकते नहीं। फिर भी--------- शब्द चुभते हैं , बिकते , रूठते भी हैं शब्द घाव ,ताव देते हैं, लड़ते भी हैं झगड़ते, बिगड़ते , बिखरते,सिहरते हैं। अतएव------ शब्दों से नहीं खेलें सोचकर ही बोलें शब्दों को मान दें और सम्मान भी दें। शब्दों पर ध्यान दें इनको पहचान दें ऊंची उड़ान दें इनको आत्मसात करें। शब्दों से उनकी बात करें, विचार करें शब्दों को सुनके, समझकर ही उत्तर दें। क्योंकि ------- शब्द अनमोल हैं जुबां से निकले बोल हैं शब्दों में धार होती है, इनमें मार होती है। महिमा अपार, शब्दों का विशाल भंडार य...

अन्ध के उजाले में गाँव कहां हैं

अन्ध के उजाले में गाँव कहां हैं?? -------------------------------------- गाँव की सुगंध हो चुकी है मन्द शीतल बयार भी नहीं रही छन्द। बैठे हैं कुछ बुर्जुवाजी शहरों में ओढ़े हैं गाँव-शहर की मकरन्द। काव्य के दोहा-चौपाई वही हैं वही सूर , तुलसी और घनानन्द। मात्र गाँवों में जन्म हुआ इनका गाँवों से नहीं कोई भी सम्बन्ध। जहां चाहें वो शहर लिख देते हैं है इनका एक खास निलय वृन्द। गाँवों में तो अनकही हलचल है शहरी बनने की छटपटी प्रछन्न। लहुलुहान हो रहे गाँव , शहरों में गाँवों में भी पहुंची शहरी चुभन। अब बैठने लगे हैं गाँव शहर पर शहर ही लील रहे हैं दिग-दिगन्त। अन्ध के उजाले में गाँव कहां हैं पेड़-पौधों का गमलों में है अन्त। आम के पेंड़ों सिर पर ढोते लोग शुद्ध हवा-पानी हुआ है अब सन्त। दो कमरे के चोंचले में रहते हैं अनन्त का लिखते हैं अनय अनन्त। ---------------- राम बहादुर राय भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश