अन्ध के उजाले में गाँव कहां हैं
अन्ध के उजाले में गाँव कहां हैं??
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गाँव की सुगंध हो चुकी है मन्द
शीतल बयार भी नहीं रही छन्द।
बैठे हैं कुछ बुर्जुवाजी शहरों में
ओढ़े हैं गाँव-शहर की मकरन्द।
काव्य के दोहा-चौपाई वही हैं
वही सूर , तुलसी और घनानन्द।
मात्र गाँवों में जन्म हुआ इनका
गाँवों से नहीं कोई भी सम्बन्ध।
जहां चाहें वो शहर लिख देते हैं
है इनका एक खास निलय वृन्द।
गाँवों में तो अनकही हलचल है
शहरी बनने की छटपटी प्रछन्न।
लहुलुहान हो रहे गाँव , शहरों में
गाँवों में भी पहुंची शहरी चुभन।
अब बैठने लगे हैं गाँव शहर पर
शहर ही लील रहे हैं दिग-दिगन्त।
अन्ध के उजाले में गाँव कहां हैं
पेड़-पौधों का गमलों में है अन्त।
आम के पेंड़ों सिर पर ढोते लोग
शुद्ध हवा-पानी हुआ है अब सन्त।
दो कमरे के चोंचले में रहते हैं
अनन्त का लिखते हैं अनय अनन्त।
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राम बहादुर राय
भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश
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