चलऽ गंवुए मिलि अंचरा के छांव
चलऽ ! गंवुवे मिलि अंचरा के छांव!!!
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छोड़ऽ नगर चलि चलऽ अपना गांव
लागी ना गरमी मिली पिपर के छांव।
अबो इहां बचल बाटे बाग बगइचा
नेह-छोह के चिरई करे चांव-चांव।
होते भोरहरिया जगावेले किरिनिया
गंगा जी क पनिया में अमृत के गांव।
गांवे हवा - पानी के बयार बहता
दूध-दही-घीवो के उमड़े दरियाव।
पाकल आम ठोरवा में लेके भागे
सुगा,कउववा खोजत खाये के ठांव।
तवकत मृगडाह में डाढ़ा लेसेला
घन बंसवरिया में मिले सीतल छांव।
डह-डह डहकेलन नगर के बेटवुवा
कहे छोड़-छाड़ के चलऽ अबो गांव।
चिरई-चुरूंग के पानी रखल जाला
घर-घर चिरइया करेली खूब नहान।
कूदि-फानि के चिरई चुगेली अनाज
देखत रोटिया काग करे कांव-कांव।
गांवहीं लउकत ताल-तलैया,पोखर
सभ मिल गंगाजी के प्रीत में नहाव।
एसी, पंखा ,कुलर काम ना करेला
जगहे-जगह फेंड़ कटे,सहर बनेला।
पत्थरे के घर में फूल धईल जाता
याद नइखे अपने पुरनियन के नांव।
एहि से कहिला छोड़ माया बाजार
चलऽ! गंवुवे मिलि अंचरा के छांव!
अबो से कहतानी चलऽ अपन गांव
ई नीरस जिनगी कब ले तूं जियबऽ
खेत-खरिहान आ बगइचा बचावऽ
फेंड़ लगाके बचा लऽ आपन गांव।
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रचना स्वरचित, मौलिक
@सर्वाधिकार सुरक्षित। ।
राम बहादुर राय
भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश
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