तुम धन्य हो प्रिये!मैं भी हूं तेरे होने में

तुम धन्य हो प्रिये! मैं भी हूं तेरे होने में
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न जाने क्या जादू है ,तुम्हारी आंखों में
आग सुलग उठती है, दिल की राहों में!

दिल के दरवाजे बन्द पड़े थे, सालों से
मिथ्या अभिमान दूर किया,निगाहों ने!

दबी ढ़की राखों में रूकी सी ,सांसों में
मुझे तृप्त कर दिया तुम्हारी निगाहों ने!

आंधी सी कौंध गयी, दिल की राहों में
मन के हर कोने में झंकृत असर हुआ!

जैसा होता होगा जादू-टोटके,टोने में
भूधर संकल्पों के पत्ते जैसे डोल गये!

रोम-रोम पुलकित हो उठे हर कोने में
तुम धन्य हो प्रिये!मैं भी हूं तेरे होने में!

तेरा होना मेरे लिए नहीं है मुझे होने में
तूं अगर नहीं ,तो तूं है मेरे हर कोने में!

न जाने कैसा जादू है तुम्हारी आंखों में
देखूं तो मर जाऊं न देखूं तो पागल सा!

मैं यायावर बना फिरू तुम्हारी आहों में
तुम धन्य हो प्रिये ! मैं भी हूं तेरे होने में!
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रचना स्वरचित और मौलिक
@सर्वाधिकार सुरक्षित।।
राम बहादुर राय
भरौली बलिया उत्तरप्रदेश
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