आदमी से ढ़ेर कुकुरे पसन बा

आदमी से ढ़ेर कुकुरे पसन बा (व्यंग्य हऽ)
---------------------------------------------------

आदमी के आदमी से कहां प्यार बा
लोगन के कुकुरे जिये के आधार बा।

आपन घर के लोगन से का मतलब
कुकुरे खातिर त किनाइल कार बा।

गाँव-समाज से कटल रहत बाड़न
कुकुरे भाई-बिरादर आ सरकार बा।

आदमी भुंकत-भोंकत थकि जइहें
उनके के पूछला के का दरकार बा।

कुकुर जी के मुंह देखल जरूरी बा
घर में त मैडमे जी के सरकार बा।

अपने नित्य क्रिया करत चाहे ना
कुकुर जी के 4 बजे टहलान बा।

सार,सरहज,साढ़ू के ढ़लल समय
अब कुकुर जी के एकक्ष राज बा।

सब रिश्ता-नाता कोना में धराइल
कुकुरे अब सबकर माई-बाप बा।

अगर गलती से कुकुर कहा गइल
उनकर उहां से खेदाई भी तय बा।

कुकुर मीट-मुर्गा खालें दूध पियसु
डभ साबुन शैम्पू उनके लागत बा।

अदिमी से त केहूके लगावे नइखे 
कुकुरे एघरी अदिमी के सवांग बा।
                 ---------------
रचना स्वरचित,मौलिक 
@सर्वाधिकार सुरक्षित। ।
राम बहादुर राय 
भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश

Comments

Popular posts from this blog

भोजपुरी के बराबरी भाषा दूसर करी ना

हो साली जब साथ में,मन पुलकित हो जाय!

युग जमाना कहां गइल,नइखे अब उ बात!