सब कुछ समझता हूं लेकिन नासमझ सा रहता हूं
सब कुछ समझता हूं,लेकिन नासमझ सा रहता हूं
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मैं साथ रहने का आदी हूं,मगर तन्हाई में ही रहता हूं
कोई कुछ भी कह देता है,उसे हंस कर ही सहता हूं।
जहां भी चला जाता हू,ढाल मैं अपने साथ रखता हूं
खंजरों में ही जन्म लिया ,खंजरों से नहीं मैं डरता हूं।
जिसके लिए सब करता हूं,उसी का मैं वार सहता हूं
मैं तो कोई कवि नहीं हूं,आहत होकर मैं लिखता हूं।
कितने बसन्त देखा हूं,लेकिन पतझड़ में ही जीता हूं
जिसको मैंने सिखाया है ,अब मैं उसी से सीखता हूं।
मैं सच के साथ रहा हूं, इसीलिए अकेले ही रहता हूं
यह जाल फरेब़ की दुनिया है,मैं फिट कहां बैठता हूं।
अब मैं किसे अपना कहूं ,अपनो से ही रंज रहता हूं
कोई कुछ भी मुझे कह देता है,चुपचाप सुन लेता हूं।
कोई मुझ पर व्यंग्य कसता है ,मैं हंसके चल देता हूं
कभी हालात मेरे बदलेंगे,ये सोचकर जिंदा रहता हूं।
यह सियासत का युग है,क्या कहूं कैसे मैं रहता हूं
सब कुछ समझता हूं ,लेकिन नासमझ सा रहता हूं।
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राम बहादुर राय
भरौली,बलिया,उत्तरप्रदेश
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