ऐसा यह संसार है
ऐसा यह संसार है.......
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इस संसार में किसे कौन पूछता है
जब काम कोई हो, तभी पूछता है।
सभी हैं अपनी आरती करवाने में
चिन्तन छोड़ ,हैं दूसरे की चिंता में।
सामर्थ्यवान को तो सभी पूजते हैं
और निरीहों का अश्रु भी रोकते हैं।
जगह-जगह अपने ही अलाप लेते
आप बोलें,वज्र से कड़क हो जाते।
छोटे हैं,उचक कर बड़े बन जाते हैं
किन्तु दूसरे को कलंकित बताते हैं।
विजय की उम्मीद किसी की देखते
दबी चीख वे ग्लानि में माथा पीटते।
सोने के छत्र से आसमां दिखाते हैं
दूसरे को जमीं पे देख डर जाते हैं।
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रचना स्वरचित और मौलिक
@सर्वाधिकार सुरक्षित। ।
राम बहादुर राय
भरैली,बलिया,उत्तर प्रदेश
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