निश्छल के संग भगवान होते हैं

निश्छल के संग भगवान होते हैं
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मैं तो रुक-रूक कर चल रहा था
वो कुछ जल-जलके रुक रहा था।

लीक तो परम्पराओं ने लगाई थी
उसे अपना बताकर रोक रहा था।

जब कुछ ठीक से चलने लगा था
वह मुझे धीरे-धीरे खींच रहा था।

मैं जैसे-जैसे आगे बढ़ने लगा था
वो कुत्सित चेहरा दिखा रहा था।

जब मैं खूब ठीक से चल रहा था
वह धू-धू कर स्वयं जल रहा था।

मैं बार-बार ही उससे बच रहा था
वो समझा मैं डरके भाग रहा था।

मैं निश्छल रुप से काम रहा था
वो हाथ धोके पीछे पड़ गया था।

अब भी मैं लगातार चल रहा हूं
वो जहां था वहीं के वहीं पड़ा है।

जो किसी का कुछ बिगाड़ा नहीं
उसके लिए तो भगवान खड़ा है।
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रचना स्वरचित और मौलिक
@सर्वाधिकार सुरक्षित
राम बहादुर राय
बलिया,उत्तर प्रदेश
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