७४-तोहरे खातिर हम तऽ,धइनी जोगिन भेस
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चहचह भइल बा मनवा,आई गइल सावन
धानी रंग धरती के, रुप बनल मनभावन।

झम झम बरिसे बदरिया,दिन लागे सुहावन
बिना साजन के हमरा,लागता झुझुवावन।

कहले रहलऽ कि सावन,में कइसहूं आइब
जेवन जेवन कहबू उ,सरधा हम पुराइब।

चढ़ल जाता सावनवा,मनवा भइल पागल
सुतल रहता सरीरिया,मनवा रहे जागल।

अंसुवन के धार गिरे,भइल जिनगी पहाड़
कबो   उंघाई  लागे , नींन  मारे दहाड़।

बैरन भइली बदरिया,रोज नचावे  नाच
समझे ना हमरो बात,करे बरिसि के खांच।

जइसे बहेला पनिया,मारेला फुंफकार
चढ़ल बाटे सावन में,कजरी के लहकार।

रचल हाथ में मेंहदी ,बसल पिया में जान
नीक ना लागे हमरा,बसे पिउ में परान।

बोली ठिठोली खउले,बोले सखि मुसुकात
नीक ना लागे मुसुकी, सावन बीतल जात।

जा रे बदरिया कारी,चोंहपा दे सनेस
तोहरे खातिर हम तऽ,धइनी जोगिन भेस।

कह राम बहादुर सुनऽ,करिहऽ जनि तूं देर
मिलते सनेस चलि दिहऽ,बचइहऽ तूं अनेर।

जुग जमाना बाउर बा,बचि के रहिहऽ जान
तोहरे पर जिहिले हम,बाड़ऽ हमरे सान।

सावन बाटे जरावन,कहीं कइसे पावन
कहे खातिर मनभावन,बाटे उ उचिलावन।
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राम बहादुर राय
भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश





























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