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Showing posts from August, 2026

निश्छल प्रेम मिलता है आज भी गॉंवों में

निश्छल प्रेम मिलता है आज भी गॉंवों में ------------------------------------ हम तो रहते हैं गॉंव की गलियों गलियों में झरती खुशबू डाली डाली और कलियों में। पक्षी करते कलरव भौंरे गुनगुन गाते हैं जहां सुनाती लोरी नदियां गॉंवों गॉंवों में। रुनझुन से पशुओं के होता रोज सबेरा जहां हैं रहते पूर्वज पीपल के पेड़ों में। राग सुनाती कोयल काग देता शुभ सन्देश रिश्तों से भरा है मोती इस भारत देश में। दुख कभी आ जाये तो लेते हैं लोग बांट निश्छल प्रेम मिलता है आज भी गॉंवों में। होता है महादानी गॉंवों का हर किसान निस्पृह भाव से सेवा देता है गॉंवों में। लट बनाकर झूलती हैं सुनहरी बालियां कभी देखो उलझे प्रेम धान के खेतों में। बेकार समझते हैं जिसे दुनिया के लोग बिखरे हैं तरबूज हमारे रेगिस्तानों में। हीरे मोती पर ममता मां की भारी है होता है धरती पर स्वर्ग मां के आंचल में। नहीं खरीद सकते हो धन दौलत से सुख बहती हैं नदियां सुख की आ जाना गॉंव में। -------------- राम बहादुर राय भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश #highlight

मरते देखता हूं पल पल में सच को यहां

मरते देखता हूं पल पल में सच को यहां! ---------------------------------- तेरी अकूत दौलत से मुझे क्या लेना‌ अपनी कमाई हुई दौलत ही काफी है! मैं तुम्हारी सेज क्यों सजाऊंगा भला ये पूरा शहर ही सेज है मेरे लिए है! तेरे आशियाने से मुझे नहीं है मतलब ये तपिश ही आशियाना है मेरे लिए! फेंके गये टुकड़ों पर नहीं है पलना मुझे ये धरती आसमान ही है मेरे लिए ! भूख लगती तो खा लेता हूं सूखे पत्ते ये पत्ते मेरी भूख मिटाने के लिए है! उसका हो जाता हूं जो चाहता है मुझे चाहत में बिक जाना ही मेरे लिए है! सच लिखना हलाहल विष पीने जैसा है विष सच का पीना भी मेरे ही लिए है! नहीं साथ दिया भाग्य ने तो क्या करता भाग्य मेरा अब लिखने के लिए ही है! मरते देखता हूं पल-पल में सच को यहां मेरा जीवन सच लिखने के लिए ही है! -------------------- राम बहादुर राय भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश #highlight
भारत में क्रान्ति की जब धधक उठी थी ज्वाला  ----------------------------------------- बिखर गई होगी हर मंजिल ध्वस्त हुई होंगी राहें देखा होगा हिन्द ने जब पुत्रों को भरते आहें! करने लगे फिरंगी थे जब धार्मिक अत्याचार  क्रांति का बीज था बोया मंगल ने गोरों को मार! पीठ पे ले कर भविष्य को सर पर कफ़न को बांध बैठ मनु बादल पर अरि से युद्ध रही थी नाध! वीर कुंवर सिंह ने ललकारा होगा जब दुश्मन को त्याग दिया होगा कैसे अपने तन मन को धन को! फूट डालकर राज करो अपनाई थी नीति बंग भंग कर तोड़ी अरि ने हिंदू मुस्लिम प्रीति! टूट गई थीं तब मर्यादा की सारी ही सीमाएं ख़ून से लतपथ हुई थी भारत मां की चार दिशाएं! महर्षि,बंकिम,बनर्जी की कलम चली होगी तब खौला होगा ख़ून हिन्द का वंदे मां कहकर जब! कर डाली होगी गोरों के शीर्ष सिंहासन की वृहद समीक्षा मात दिया था सत्येद्र ने जब देकर सिविल परीक्षा! जिससे कांपते रहते गोरे ऐसा था आज़ाद  डायर ऊधम के आगे दम तोड़ गया जल्लाद! मिलकर लड़े थे हिंदू मुस्लिम बिस्मिल और अशफ़ाक़ और सुभाष की अपनी सेना जय हिंद आजाद! चापेकर,चाकी,बाघा और जतिन भी कैसे होंगे  जान बचाए जिनसे फिरते रहे फिरंगी हों...

नहीं कोई अपना इस ज़माने में

नहीं कोई अपना इस ज़माने में ---------------------------- कट गये दिन बुरे मेरे सवालों में ढूंढते रहे जिन्हें हम किताबों में। क्या पता वक्त देगा धोखा मुझे जी रहे थे जिस वक्त को ख्वाबों में है कोई पहेली कि है मंजर बुरा चलाया खंजर अपनों ने जज्बातों में। फिर भी किया गुनाह उनका मैं क्षमा ले लिया है उसे अपने खाते में। बात दिल की करें तो करें किससे टूट गया दिल अब विश्वासघातों में बात को कह दिया होता बातों में नहीं फंसना हमें झंझावातों में। हो गया है लोमड़ी अब आदमी लगा है दूसरे को फंसाने में। बच के रहना तुम ऐ राम बहादुर नहीं कोई अपना इस ज़माने में ------------ राम बहादुर राय भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश #highlight

हम नहीं हैं कभी पाला बदलने वाले

हम नहीं हैं कभी पाला बदलने वाले ------------------------------- तिल तिल के जलते रहेंगे जलने वाले हम हैं ज़हर को भी शहद बनाने वाले। है कैसा ज़माना हमें मतलब है क्या क्या जानें प्यार क्या है ज़माने वाले। तुम रार करो या नफरत कर लो मुझसे नहीं वजूद से अपने हम डिगने वाले। कोई करता है सियासत तो करता रहे हम भाईचारे को नहीं तोड़ने वाले। रक्षा मान सम्मान का भी हम कर लेंगे नहीं टुकड़ों पर किसी के हम पलने वाले। कायम हैं कायम रहेंगे बात पर अपनी हम नहीं हैं कभी पाला बदलने वाले। भले ही फक्कड़ आदमी हैं राम बहादुर किसी के रहम पर नहीं हैं जीने वाले। मैदान में अगर हम उतर ही जायेंगे किसी कीमत पर नहीं हैं भागने वाले। ------------- राम बहादुर राय भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश #highlight

होगा जुनून तो निश्चित ही जीत जाओगे

होगा जुनून तो निश्चित ही जीत जाओगे ---------------------------------- हार हो जायेगी जब मन से हार जाओगे ठान लोगे अगर मन से तो जीत जाओगे। होना है खरा सोना तो तपना भी होगा बिना तपे तपाये कुछ नहीं बन पाओगे। कौन पूछेगा तुम्हें अगर नहीं होगे सफल दूध की मक्खी जैसे फेंक दिये जाओगे। किसी को देखकर चाहते हो उड़ना अगर सोच लेना जो किया है क्या कर पाओगे। उड़ने के लिए भी चाहिए ज़मीन अपनी नहीं होगी ज़मीन तो कैसे उड़ पाओगे। कौन कहता है कि जीत नहीं सकते तुम होगा जुनून तो निश्चित ही जीत जाओगे। कहने के लिए तो कुछ भी कह सकते हो कर के देखना कभी वैसा बन पाओगे। हो जज्बा जुनून पर मेहनत भी जरूरी है ये न समझो बिना मेहनत जीत जाओगे। जी जान से लगे रहना तुम राम बहादुर जिंदा नहीं मरने पर याद किये जाओगे। बनाना है इतिहास तो संघर्ष करते रहो हार जीत से क्या इतिहास बना जाओगे।    -------------- राम बहादुर राय  भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश  #highlight

५९-कहां होत बरसात

कहां होत बरसात बा,लउकत धूरे-धूर लहकत बिया ई धरती,डहकत बा मजदूर।। हर-बैल के युग नइखे,रोवत बा अब खेत जोत लगावे टेकटर,चले जइसे बहेंत।। हर हरवाह कहां गइल,गइल काम सब छूट खेती के अब नाम पर,कइल जात बा लूट।। काम होखे बैलन से,बैले बरध कहाव दूध दही तऽ खाव सब,माठा बचल महाव।। हर रहे कि बैलगाड़ी,जोड़ा बैल नधाव होत भिनुसार खेत में,बाजे रोज बधाव।। माटी-माटी के भेद,केकरा से कहाव कहीं चिकन कहीं कड़ेर,अलगे अलग लहाव।। कहीं दोमट कहीं पियर,कहीं गंगा कछार बरखा में भिंजे मड़ई,नीक लागे बछार।। मटिगर खेत उपजाऊ,हऽ अनाज के गाढ़ लतरी,चना-जौ,मसूर,के करे खूब बाढ़।। गंगवट रोटी जइसन,लागे चिकन पिसान तरकारी से घर भरे,करजा भरे किसान।। बलधुस में सुथनी पटर,फरे खूब बिन साज भिंडी लतरा सतपुतिया,बचावत रहे लाज।। धनिया मरिचा से खेत,रहत खूल लहकार तरकारी में टमाटर,बनल रहे मलिकार।।           ---------------- राम बहादुर राय  भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश

होगा जुनून तो निश्चित ही जीत जाओगे।।

होगा जुनून तो निश्चित ही जीत जाओगे ---------------------------------- हार हो जायेगी जब मन से हार जाओगे ठान लोगे अगर मन से तो जीत जाओगे। होना है खरा सोना तो तपना भी होगा बिना तपे तपाये कुछ नहीं बन पाओगे। कौन पूछेगा तुम्हें अगर नहीं होगे सफल दूध की मक्खी जैसे फेंक दिये जाओगे। किसी को देखकर चाहते हो उड़ना अगर सोच लेना जो किया है क्या कर पाओगे। उड़ने के लिए भी चाहिए ज़मीन अपनी नहीं होगी ज़मीन तो कैसे उड़ पाओगे। कौन कहता है कि जीत नहीं सकते तुम होगा जुनून तो निश्चित ही जीत जाओगे। कहने के लिए तो कुछ भी कह सकते हो कर के देखना कभी वैसा बन पाओगे। हो जज्बा जुनून पर मेहनत भी जरूरी है ये न समझो बिना मेहनत जीत जाओगे। जी जान से लगे रहना तुम राम बहादुर जिंदा नहीं मरने पर याद किये जाओगे। बनाना है इतिहास तो संघर्ष करते रहो हार जीत से क्या इतिहास बना जाओगे। -------------- राम बहादुर राय भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश #highlight
५८-आलू भंटा       -------------------------------- आलू-भंटा के रहल,हर जगह खूब मांग बंडा अरुई के रहल,धरती भीतर टांग। सनई फूल रहे पियर,होखे नीमन साग बथुआ मेथी खाव जे,दुख जात रहे भाग। अगहनिया बाजरा तऽ,रहे असली भोजन होत रहल साग रोटी,घर घर के परोजन। सावां टांगुन के फसल,होखत रहल आगत हित-नात के होत रहल,घरे घरे सुवागत। उठी सुती सब लोग तऽ,खेतो घूमे जाव लाई गुरलाई बने,मिलजुल के सब खाव। बांस पतलो भरल रहे,मड़ई रहल छवात केतनो होखे गरमी,सुते सब फोंफियात। दूध दही के बाढ़ से,भरल रहल दरियाव जेकरा जेवन चाहे,सीकम भर के खाव। पंथी के छाया मिले,पंछी गावे राग नीमन खूब लोग रहे,बुतावत रहे आग। आदमी रहल आदमी,बोले नीमन बोल साफ दिल के रहे लोग,रहे ना कहीं झोल। अरहर चना मसूर के,घर घर दाल दराव रोटी दाल के संगे,घीव डालि सब खाव। केहू के धन देखि के,रखे लोग ना डाह केहू के दुख देखिके,करे लोग सब आह। केहू भटके राहि में,करे लोग सहयोग होखे झगरा केतनो,तबो करसु सहयोग। ------------- राम बहादुर राय भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश

५९-कहां होत बरसात बा,लउकत धूरे धूर

कहां होत बरसात बा,लउकत धूरे-धूर लहकत बिया ई धरती,डहकत बा मजदूर।। हर-बैल के युग नइखे,रोवत बा अब खेत जोत लगावे टेकटर,चले जइसे बहेंत।। हर हरवाह कहां गइल,गइल काम सब छूट खेती के अब नाम पर,कइल जात बा लूट।। काम होखे बैलन से,बैले बरध कहाव दूध दही तऽ खाव सब,माठा बचल महाव।। हर रहे कि बैलगाड़ी,जोड़ा बैल नधाव होत भिनुसार खेत में,बाजे रोज बधाव।। माटी-माटी के भेद,केकरा से कहाव कहीं चिकन कहीं कड़ेर,अलगे अलग लहाव।। कहीं दोमट कहीं पियर,कहीं गंगा कछार बरखा में भिंजे मड़ई,नीक लागे बछार।। मटिगर खेत उपजाऊ,हऽ अनाज के गाढ़ लतरी,चना-जौ,मसूर,के करे खूब बाढ़।। गंगवट रोटी जइसन,लागे चिकन पिसान तरकारी से घर भरे,करजा भरे किसान।। बलधुस में सुथनी पटर,फरे खूब बिन साज भिंडी लतरा सतपुतिया,बचावत रहे लाज।। धनिया मरिचा से खेत,रहत खूल लहकार तरकारी में टमाटर,बनल रहे मलिकार।। ---------------- राम बहादुर राय भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश

६१-हुमचा हुमची होत बा

हुमचा हुमची होत बा, भीतर से बा बैर परि जइबऽ तूं फेर में,पूछी ना तब खैर।। गोटी सेट सब करता,आपन आपन फेर जब मिल जाई आसरा,बनी तब सवा सेर।। ह‌ऽ बड़का घराना के,कहत रही दिन रात केतनो नीमन रहबऽ,सुनी ना कबो बात।। मोल भाव खूब चलता, प्रतिभा के का मोल कोइला सोना के अब,तवुलत एके तोल। चलत रहल खेला खूब,अजुवो चलता खेल पापी बाहर घूमता, निर्दोष ठटता जेल। उमिर बीतल पढला में,पढि के बनल नोकर अंगुठा छाप उपर बा,सहऽ ओकर ठोकर। थीर धीर सरीफ रहल,बहुत कठिन बा काम हलुक ओछा लोगन के,बड़का झमकत नाम। युग ज़माना आइल बा,अब बने के अय्यार के आपन के आन हऽ,बड़ा कठिन बा यार। --------------- राम बहादुर राय
६१-गॉंव के गोहार ----------------- धरती से आकास तक,भइल बा धूर धूर आवत नइखे समझ में,आइल कइसे धूर।। लेके आरी काटता,गॉंव नगर के फेंड़ काट कूट के बेचता,जइसे होखे रेंड़।। आम महुआ जामुन के,नइखे लागत थाह काटत बाटे जे फेंड़,परी ओहपर आह।। लवना लकड़ी ना मिली,मिली कहां अब छांह दतुवन पल्लो के अब तऽ,ठूंठ हो गइल जाह।। चुवत रहे आम महुआ,बिने सब रहे जात आन्ही पानी रहे भा,होत रहे बरसात।। होखत रहे अगोरिया,चुवत रहे जब आम बइठल रहे लोग उहां,छोड़ि छाड़ि के काम।। पाकल अमवा खाइके,भरि जात रहे पेट मिले लपसी महुआ के,खाव लोग भरपेट।। ‌रहत रही सोन चिरई,फेंड़वे फर लुकास कटि गइल बा फेंड़ ओंड़,होई गइल विकास।। रहबू कहां ए चिरई,कटा गइल सब फेंड़ कहां रही अब खोंड़िला,नइखे लउकत फेंड़।। सुग्गा मैना चोंचा,नेउर कुकुर बिलार खेंखर खरगोस कहता,अदिमी भइल सियार।। रहल गॉंव के आसरा,उहो गइल अब टूट सहर से गइल गॉंव बा,मचल बा जहां लूट।। अब तऽ हालत ई भइल,सहर रहल ना गॉंव दिन दिन दसा बिगरत बा,नया भइल मलिकांव।।                      ------------------ राम बहादुर राय भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश
७८-#गॉंव_जवार# अब तऽ टूटल जात बा,गॉंव के सब मयार नेह छोह के बदरिया,उड़ा दिहलस बयार। गॉंव घर से भागत बा,चाहत बा आराम ठेला खिंचिहें सहर में,परिहन ना बेराम। मालिक रहलें गॉंव में,बने गइलन नोकर देखा देखी करे में,बनल सहरी जोकर। काम करसु छतियाफार,गारी खाके रोज आधा तिहा खासु तबो,काम करें ना ओज। देखसु चान ना सूरज,होई गइलन गोर हरदी अस पियर होके,काछत बाड़ें लोर। आवसु ई गॉंवे कबो,बोलसु सहरी बोल फेंकसु लमहर एतना,गंवुए लिहन मोल। किनिहें फुटपाथ पर ई,कपड़ा जूता सेट छंटिहेन अंग्रेजी में, तुम तड़ाक भरपेट। एक कमरा के दरबा,नइखे रोशनदान बहस करेले अइसे कि,लाट के खानदान। आपन घर आपन खेत,छोड़त बाटे लोग सहर  में  जाके नोकर, होई  जाता लोग। गॉंव छूटल घर छूटल,छूटि गइल परिवार छूटल बोली ठिठोली,छूटल सुघर जवार। का बाबू का हाल बा ,के पूछत बा आज तेरे मेरे  चलत  बा,सब भइल  महाराज। कह राम बहादुर सुनऽ,करिहऽ तूं बरदास बचावल जाव गॉंव के,करिहऽ तूं अरदास।                     --------------- राम बहादुर राय भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश
७९-#नवका_जुग_जमाना बोलत लोग बा अइसन,जइसे मिसिरी घोल मने मने समझे लोग,अनका के बकलोल। पंछी आ पंथी देखि,बान्हसु खूब जोर कइसे फंसाई दिहीं,बिना मचवले सोर। बनत बाड़न हिटलर तऽ,कइसे लागी मोह करता कतल केहू के,बिना कइले बिछोह। ऊंच पीढ़ा पर बइठल,कइले नीच निगाह अपने पियता सोम रस,राखे सबसे डाह। जेतने बड़का बाड़न,ओतने दिहन सीख भीखमंगन से छीनी,मांगल ओकर भीख। बढ़ल आगे देखी तऽ,जरि थरि होई राख जइसे तइसे काटी उ,बाटे जेवन साख। नीयत देख बदलेला,पल पल ओकर रंग ढ़ली सांचा में कवनो,करी रंग में भंग। सुनऽ हो राम बहादुर,करिहऽ नीमन काम  धीरज संतोष रखिहऽ,बढ़इहें जरुर राम। जुग जमाना अइसन बा,पुतवो भतरो मीठ  जेतने नीमन लउकी,ओतने रही ढ़ीठ। जेकर रहेला चलती,गाई उनकर गीत काम से हवुए साथी,बिना काम ना मीत।                    -------------- राम बहादुर राय  भरौली,,बलिया,उत्तर प्रदेश   
७८-#गॉंव_जवार#  अब तऽ टूटल जात बा,गॉंव के सब मयार नेह छोह के बदरिया,उड़ा दिहलस बयार। गॉंव घर से भागत बा,चाहत बा आराम ठेला खिंचिहें सहर में,परिहन ना बेराम। मालिक रहलें गॉंव में,बने गइलन नोकर देखा देखी करे में,बनल सहरी जोकर। काम करसु छतियाफार,गारी खाके रोज आधा तिहा खासु तबो,काम करें ना ओज। देखसु चान ना सूरज,होई गइलन गोर हरदी अस पियर होके,काछत बाड़ें लोर। आवसु ई गॉंवे कबो,बोलसु सहरी बोल फेंकसु लमहर एतना,गंवुए लिहन मोल। किनिहें फुटपाथ पर ई,कपड़ा जूता सेट छंटिहेन अंग्रेजी में, तुम तड़ाक भरपेट। एक कमरा के दरबा,नइखे रोशनदान  बहस करेले अइसे कि,लाट के खानदान। आपन घर आपन खेत,छोड़त बाटे लोग  सहर में जाके नोकर, होई जाता लोग। गॉंव छूटल घर छूटल,छूटि गइल परिवार  छूटल बोली ठिठोली,छूटल सुघर जवार। का बाबू का हाल बा ,के पूछत बा आज तेरे मेरे चलत बा,सब भइल महाराज। कह राम बहादुर सुनऽ,करिहऽ तूं बरदास  बचावल जाव गॉंव के,करिहऽ तूं अरदास।                     --------------- राम बहादुर राय 
७७-जब जब परे सूखा तऽ,हरपरउड़ी गवाव        ---------------------------------- अब कहां बरिसत बाटे,झूठिया बा बादर कबो करिया कबो भुवर,तनले रहे चादर। गरजे तड़पे दिन रात,बरिसे कहां सावन धूर गरदा उड़त चले,जइसे चलत रावन। कहां परता सीत घाम,कहां गवाता गीत पहिले अस कहंवा बा,केहू के अब मीत। चलता सब सेंगरा पर,छूटल सबसे प्रेम बात केहू करतो बा,करहीं खातिर नेम। काम होखे बरखा के,अरघा खूब भराव गॉंव जवार करे खूब,अरघा के दरियाव। जब जब सूखा परे तऽ,हरपरउड़ी गवाव  नंगे हर चलवला पर,बरखा कहां अड़ाव। अब तऽ नइखे होत ई ,बाटे बात पुरान  खेती दूर से होता, बनता लोग धुरान। होत रहे खेती खूब,सुखी रहल परिवार  ठकचल रहे अनाज से, संवुसे घर दुवार। छप्पन कोटि के बरखा,बरिसत रहे सावन बनि ना पावे खायका,भीज जाव जलावन। मारत रहे झपसी जब,भीजे घर ओसार  भरे ठेघुन भर पानी, बन होखे निकसार।  झपसी में गपसल रहे,टांगुन के सब बाल मारे पछिमा गिर जाव, लागे जइसे लाल। सुनऽ हो राम बहादुर,नइखे अब उ बहार पहिले अस कुछू नइखे,दुलम बाटे लहार।                    -------------- राम बहादुर राय  भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश   
७४-तोहरे खातिर हम तऽ,धइनी जोगिन भेस       ----------------------------------- चहचह भइल बा मनवा,आई गइल सावन धानी रंग धरती के, रुप बनल मनभावन। झम झम बरिसे बदरिया,दिन लागे सुहावन बिना साजन के हमरा,लागता झुझुवावन। कहले रहलऽ कि सावन,में कइसहूं आइब जेवन जेवन कहबू उ,सरधा हम पुराइब। चढ़ल जाता सावनवा,मनवा भइल पागल सुतल रहता सरीरिया,मनवा रहे जागल। अंसुवन के धार गिरे,भइल जिनगी पहाड़ कबो   उंघाई  लागे , नींन  मारे दहाड़। बैरन भइली बदरिया,रोज नचावे  नाच समझे ना हमरो बात,करे बरिसि के खांच। जइसे बहेला पनिया,मारेला फुंफकार चढ़ल बाटे सावन में,कजरी के लहकार। रचल हाथ में मेंहदी ,बसल पिया में जान नीक ना लागे हमरा,बसे पिउ में परान। बोली ठिठोली खउले,बोले सखि मुसुकात नीक ना लागे मुसुकी, सावन बीतल जात। जा रे बदरिया कारी,चोंहपा दे सनेस तोहरे खातिर हम तऽ,धइनी जोगिन भेस। कह राम बहादुर सुनऽ,करिहऽ जनि तूं देर मिलते सनेस चलि दिहऽ,बचइहऽ तूं अनेर। जुग जमाना बाउर बा,बचि के रहिहऽ जान तोहरे पर जिहिले हम,बाड़ऽ हमरे सान। सावन बाटे जरावन,कहीं कइसे पावन कहे खातिर मनभावन,बाटे उ उचिलावन।                  --------------- राम ब...