मरते देखता हूं पल पल में सच को यहां

मरते देखता हूं पल पल में सच को यहां!
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तेरी अकूत दौलत से मुझे क्या लेना‌
अपनी कमाई हुई दौलत ही काफी है!

मैं तुम्हारी सेज क्यों सजाऊंगा भला
ये पूरा शहर ही सेज है मेरे लिए है!

तेरे आशियाने से मुझे नहीं है मतलब
ये तपिश ही आशियाना है मेरे लिए!

फेंके गये टुकड़ों पर नहीं है पलना मुझे
ये धरती आसमान ही है मेरे लिए !

भूख लगती तो खा लेता हूं सूखे पत्ते
ये पत्ते मेरी भूख मिटाने के लिए है!

उसका हो जाता हूं जो चाहता है मुझे
चाहत में बिक जाना ही मेरे लिए है!

सच लिखना हलाहल विष पीने जैसा है
विष सच का पीना भी मेरे ही लिए है!

नहीं साथ दिया भाग्य ने तो क्या करता
भाग्य मेरा अब लिखने के लिए ही है!

मरते देखता हूं पल-पल में सच को यहां
मेरा जीवन सच लिखने के लिए ही है!
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राम बहादुर राय
भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश
#highlight

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