७७-जब जब परे सूखा तऽ,हरपरउड़ी गवाव
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अब कहां बरिसत बाटे,झूठिया बा बादर
कबो करिया कबो भुवर,तनले रहे चादर।
गरजे तड़पे दिन रात,बरिसे कहां सावन
धूर गरदा उड़त चले,जइसे चलत रावन।
कहां परता सीत घाम,कहां गवाता गीत
पहिले अस कहंवा बा,केहू के अब मीत।
चलता सब सेंगरा पर,छूटल सबसे प्रेम
बात केहू करतो बा,करहीं खातिर नेम।
काम होखे बरखा के,अरघा खूब भराव
गॉंव जवार करे खूब,अरघा के दरियाव।
जब जब सूखा परे तऽ,हरपरउड़ी गवाव
नंगे हर चलवला पर,बरखा कहां अड़ाव।
अब तऽ नइखे होत ई ,बाटे बात पुरान
खेती दूर से होता, बनता लोग धुरान।
होत रहे खेती खूब,सुखी रहल परिवार
ठकचल रहे अनाज से, संवुसे घर दुवार।
छप्पन कोटि के बरखा,बरिसत रहे सावन
बनि ना पावे खायका,भीज जाव जलावन।
मारत रहे झपसी जब,भीजे घर ओसार
भरे ठेघुन भर पानी, बन होखे निकसार।
झपसी में गपसल रहे,टांगुन के सब बाल
मारे पछिमा गिर जाव, लागे जइसे लाल।
सुनऽ हो राम बहादुर,नइखे अब उ बहार
पहिले अस कुछू नइखे,दुलम बाटे लहार।
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राम बहादुर राय
भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश
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