५९-कहां होत बरसात बा,लउकत धूरे धूर

कहां होत बरसात बा,लउकत धूरे-धूर
लहकत बिया ई धरती,डहकत बा मजदूर।।

हर-बैल के युग नइखे,रोवत बा अब खेत
जोत लगावे टेकटर,चले जइसे बहेंत।।

हर हरवाह कहां गइल,गइल काम सब छूट
खेती के अब नाम पर,कइल जात बा लूट।।

काम होखे बैलन से,बैले बरध कहाव
दूध दही तऽ खाव सब,माठा बचल महाव।।

हर रहे कि बैलगाड़ी,जोड़ा बैल नधाव
होत भिनुसार खेत में,बाजे रोज बधाव।।

माटी-माटी के भेद,केकरा से कहाव
कहीं चिकन कहीं कड़ेर,अलगे अलग लहाव।।

कहीं दोमट कहीं पियर,कहीं गंगा कछार
बरखा में भिंजे मड़ई,नीक लागे बछार।।

मटिगर खेत उपजाऊ,हऽ अनाज के गाढ़
लतरी,चना-जौ,मसूर,के करे खूब बाढ़।।

गंगवट रोटी जइसन,लागे चिकन पिसान
तरकारी से घर भरे,करजा भरे किसान।।

बलधुस में सुथनी पटर,फरे खूब बिन साज
भिंडी लतरा सतपुतिया,बचावत रहे लाज।।

धनिया मरिचा से खेत,रहत खूल लहकार
तरकारी में टमाटर,बनल रहे मलिकार।।
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राम बहादुर राय
भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश

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