५८-आलू भंटा
--------------------------------
आलू-भंटा के रहल,हर जगह खूब मांग
बंडा अरुई के रहल,धरती भीतर टांग।
सनई फूल रहे पियर,होखे नीमन साग
बथुआ मेथी खाव जे,दुख जात रहे भाग।
अगहनिया बाजरा तऽ,रहे असली भोजन
होत रहल साग रोटी,घर घर के परोजन।
सावां टांगुन के फसल,होखत रहल आगत
हित-नात के होत रहल,घरे घरे सुवागत।
उठी सुती सब लोग तऽ,खेतो घूमे जाव
लाई गुरलाई बने,मिलजुल के सब खाव।
बांस पतलो भरल रहे,मड़ई रहल छवात
केतनो होखे गरमी,सुते सब फोंफियात।
दूध दही के बाढ़ से,भरल रहल दरियाव
जेकरा जेवन चाहे,सीकम भर के खाव।
पंथी के छाया मिले,पंछी गावे राग
नीमन खूब लोग रहे,बुतावत रहे आग।
आदमी रहल आदमी,बोले नीमन बोल
साफ दिल के रहे लोग,रहे ना कहीं झोल।
अरहर चना मसूर के,घर घर दाल दराव
रोटी दाल के संगे,घीव डालि सब खाव।
केहू के धन देखि के,रखे लोग ना डाह
केहू के दुख देखिके,करे लोग सब आह।
केहू भटके राहि में,करे लोग सहयोग
होखे झगरा केतनो,तबो करसु सहयोग।
-------------
राम बहादुर राय
भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश
Comments
Post a Comment