निश्छल प्रेम मिलता है आज भी गॉंवों में

निश्छल प्रेम मिलता है आज भी गॉंवों में
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हम तो रहते हैं गॉंव की गलियों गलियों में
झरती खुशबू डाली डाली और कलियों में।

पक्षी करते कलरव भौंरे गुनगुन गाते हैं
जहां सुनाती लोरी नदियां गॉंवों गॉंवों में।

रुनझुन से पशुओं के होता रोज सबेरा
जहां हैं रहते पूर्वज पीपल के पेड़ों में।

राग सुनाती कोयल काग देता शुभ सन्देश
रिश्तों से भरा है मोती इस भारत देश में।

दुख कभी आ जाये तो लेते हैं लोग बांट
निश्छल प्रेम मिलता है आज भी गॉंवों में।

होता है महादानी गॉंवों का हर किसान
निस्पृह भाव से सेवा देता है गॉंवों में।

लट बनाकर झूलती हैं सुनहरी बालियां
कभी देखो उलझे प्रेम धान के खेतों में।

बेकार समझते हैं जिसे दुनिया के लोग
बिखरे हैं तरबूज हमारे रेगिस्तानों में।

हीरे मोती पर ममता मां की भारी है
होता है धरती पर स्वर्ग मां के आंचल में।

नहीं खरीद सकते हो धन दौलत से सुख
बहती हैं नदियां सुख की आ जाना गॉंव में।
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राम बहादुर राय
भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश
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