६१-हुमचा हुमची होत बा
हुमचा हुमची होत बा, भीतर से बा बैर
परि जइबऽ तूं फेर में,पूछी ना तब खैर।।
गोटी सेट सब करता,आपन आपन फेर
जब मिल जाई आसरा,बनी तब सवा सेर।।
हऽ बड़का घराना के,कहत रही दिन रात
केतनो नीमन रहबऽ,सुनी ना कबो बात।।
मोल भाव खूब चलता, प्रतिभा के का मोल
कोइला सोना के अब,तवुलत एके तोल।
चलत रहल खेला खूब,अजुवो चलता खेल
पापी बाहर घूमता, निर्दोष ठटता जेल।
उमिर बीतल पढला में,पढि के बनल नोकर
अंगुठा छाप उपर बा,सहऽ ओकर ठोकर।
थीर धीर सरीफ रहल,बहुत कठिन बा काम
हलुक ओछा लोगन के,बड़का झमकत नाम।
युग ज़माना आइल बा,अब बने के अय्यार
के आपन के आन हऽ,बड़ा कठिन बा यार।
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राम बहादुर राय
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