६१-गॉंव के गोहार
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धरती से आकास तक,भइल बा धूर धूर
आवत नइखे समझ में,आइल कइसे धूर।।
लेके आरी काटता,गॉंव नगर के फेंड़
काट कूट के बेचता,जइसे होखे रेंड़।।
आम महुआ जामुन के,नइखे लागत थाह
काटत बाटे जे फेंड़,परी ओहपर आह।।
लवना लकड़ी ना मिली,मिली कहां अब छांह
दतुवन पल्लो के अब तऽ,ठूंठ हो गइल जाह।।
चुवत रहे आम महुआ,बिने सब रहे जात
आन्ही पानी रहे भा,होत रहे बरसात।।
होखत रहे अगोरिया,चुवत रहे जब आम
बइठल रहे लोग उहां,छोड़ि छाड़ि के काम।।
पाकल अमवा खाइके,भरि जात रहे पेट
मिले लपसी महुआ के,खाव लोग भरपेट।।
रहत रही सोन चिरई,फेंड़वे फर लुकास
कटि गइल बा फेंड़ ओंड़,होई गइल विकास।।
रहबू कहां ए चिरई,कटा गइल सब फेंड़
कहां रही अब खोंड़िला,नइखे लउकत फेंड़।।
सुग्गा मैना चोंचा,नेउर कुकुर बिलार
खेंखर खरगोस कहता,अदिमी भइल सियार।।
रहल गॉंव के आसरा,उहो गइल अब टूट
सहर से गइल गॉंव बा,मचल बा जहां लूट।।
अब तऽ हालत ई भइल,सहर रहल ना गॉंव
दिन दिन दसा बिगरत बा,नया भइल मलिकांव।।
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राम बहादुर राय
भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश
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