७८-#गॉंव_जवार#
अब तऽ टूटल जात बा,गॉंव के सब मयार
नेह छोह के बदरिया,उड़ा दिहलस बयार।
गॉंव घर से भागत बा,चाहत बा आराम
ठेला खिंचिहें सहर में,परिहन ना बेराम।
मालिक रहलें गॉंव में,बने गइलन नोकर
देखा देखी करे में,बनल सहरी जोकर।
काम करसु छतियाफार,गारी खाके रोज
आधा तिहा खासु तबो,काम करें ना ओज।
देखसु चान ना सूरज,होई गइलन गोर
हरदी अस पियर होके,काछत बाड़ें लोर।
आवसु ई गॉंवे कबो,बोलसु सहरी बोल
फेंकसु लमहर एतना,गंवुए लिहन मोल।
किनिहें फुटपाथ पर ई,कपड़ा जूता सेट
छंटिहेन अंग्रेजी में, तुम तड़ाक भरपेट।
एक कमरा के दरबा,नइखे रोशनदान
बहस करेले अइसे कि,लाट के खानदान।
आपन घर आपन खेत,छोड़त बाटे लोग
सहर में जाके नोकर, होई जाता लोग।
गॉंव छूटल घर छूटल,छूटि गइल परिवार
छूटल बोली ठिठोली,छूटल सुघर जवार।
का बाबू का हाल बा ,के पूछत बा आज
तेरे मेरे चलत बा,सब भइल महाराज।
कह राम बहादुर सुनऽ,करिहऽ तूं बरदास
बचावल जाव गॉंव के,करिहऽ तूं अरदास।
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राम बहादुर राय
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