भारत में क्रान्ति की जब धधक उठी थी ज्वाला ----------------------------------------- बिखर गई होगी हर मंजिल ध्वस्त हुई होंगी राहें देखा होगा हिन्द ने जब पुत्रों को भरते आहें! करने लगे फिरंगी थे जब धार्मिक अत्याचार क्रांति का बीज था बोया मंगल ने गोरों को मार! पीठ पे ले कर भविष्य को सर पर कफ़न को बांध बैठ मनु बादल पर अरि से युद्ध रही थी नाध! वीर कुंवर सिंह ने ललकारा होगा जब दुश्मन को त्याग दिया होगा कैसे अपने तन मन को धन को! फूट डालकर राज करो अपनाई थी नीति बंग भंग कर तोड़ी अरि ने हिंदू मुस्लिम प्रीति! टूट गई थीं तब मर्यादा की सारी ही सीमाएं ख़ून से लतपथ हुई थी भारत मां की चार दिशाएं! महर्षि,बंकिम,बनर्जी की कलम चली होगी तब खौला होगा ख़ून हिन्द का वंदे मां कहकर जब! कर डाली होगी गोरों के शीर्ष सिंहासन की वृहद समीक्षा मात दिया था सत्येद्र ने जब देकर सिविल परीक्षा! जिससे कांपते रहते गोरे ऐसा था आज़ाद डायर ऊधम के आगे दम तोड़ गया जल्लाद! मिलकर लड़े थे हिंदू मुस्लिम बिस्मिल और अशफ़ाक़ और सुभाष की अपनी सेना जय हिंद आजाद! चापेकर,चाकी,बाघा और जतिन भी कैसे होंगे जान बचाए जिनसे फिरते रहे फिरंगी हों...
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७७-जब जब परे सूखा तऽ,हरपरउड़ी गवाव ---------------------------------- अब कहां बरिसत बाटे,झूठिया बा बादर कबो करिया कबो भुवर,तनले रहे चादर। गरजे तड़पे दिन रात,बरिसे कहां सावन धूर गरदा उड़त चले,जइसे चलत रावन। कहां परता सीत घाम,कहां गवाता गीत पहिले अस कहंवा बा,केहू के अब मीत। चलता सब सेंगरा पर,छूटल सबसे प्रेम बात केहू करतो बा,करहीं खातिर नेम। काम होखे बरखा के,अरघा खूब भराव गॉंव जवार करे खूब,अरघा के दरियाव। जब जब सूखा परे तऽ,हरपरउड़ी गवाव नंगे हर चलवला पर,बरखा कहां अड़ाव। अब तऽ नइखे होत ई ,बाटे बात पुरान खेती दूर से होता, बनता लोग धुरान। होत रहे खेती खूब,सुखी रहल परिवार ठकचल रहे अनाज से, संवुसे घर दुवार। छप्पन कोटि के बरखा,बरिसत रहे सावन बनि ना पावे खायका,भीज जाव जलावन। मारत रहे झपसी जब,भीजे घर ओसार भरे ठेघुन भर पानी, बन होखे निकसार। झपसी में गपसल रहे,टांगुन के सब बाल मारे पछिमा गिर जाव, लागे जइसे लाल। सुनऽ हो राम बहादुर,नइखे अब उ बहार पहिले अस कुछू नइखे,दुलम बाटे लहार। -------------- राम बहादुर राय भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश
५९-कहां होत बरसात बा,लउकत धूरे धूर
कहां होत बरसात बा,लउकत धूरे-धूर लहकत बिया ई धरती,डहकत बा मजदूर।। हर-बैल के युग नइखे,रोवत बा अब खेत जोत लगावे टेकटर,चले जइसे बहेंत।। हर हरवाह कहां गइल,गइल काम सब छूट खेती के अब नाम पर,कइल जात बा लूट।। काम होखे बैलन से,बैले बरध कहाव दूध दही तऽ खाव सब,माठा बचल महाव।। हर रहे कि बैलगाड़ी,जोड़ा बैल नधाव होत भिनुसार खेत में,बाजे रोज बधाव।। माटी-माटी के भेद,केकरा से कहाव कहीं चिकन कहीं कड़ेर,अलगे अलग लहाव।। कहीं दोमट कहीं पियर,कहीं गंगा कछार बरखा में भिंजे मड़ई,नीक लागे बछार।। मटिगर खेत उपजाऊ,हऽ अनाज के गाढ़ लतरी,चना-जौ,मसूर,के करे खूब बाढ़।। गंगवट रोटी जइसन,लागे चिकन पिसान तरकारी से घर भरे,करजा भरे किसान।। बलधुस में सुथनी पटर,फरे खूब बिन साज भिंडी लतरा सतपुतिया,बचावत रहे लाज।। धनिया मरिचा से खेत,रहत खूल लहकार तरकारी में टमाटर,बनल रहे मलिकार।। ---------------- राम बहादुर राय भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश
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