बैठे हैं जाल बिछाये चारों तरफ शिकारी

बैठे हैं जाल बिछाये चारों तरफ शिकारी
कौन फंसाये कितना कर रहे मारा मारी।

जिसे देखते मालधनी माया वहीं फैलाते
बनकर मासूम लोगों को लेते छीन क्यारी।

पिला देते हैं ज़हर को बताके शहद मीठा
समझ नहीं पाता है कोई इनकी अय्यारी।

रोते  हैं  घर में अपने  मृदंग  बजाते बाहर
प्रेम  सुधा  बरसाकर  चला  देते हैं आरी।

करते  हैं  बात  ऐसे   जैसे  हों  महाज्ञानी
बढ़ता देख किसी को चलाते छुरी कटारी।

वक्त के  हिसाब से बदलते  रहते हैं चोला
प्यार जतायें जिसपे नुकसान करेंगे भारी।

दिखावे का रहता है चेहरा मासूम इनका
पलक झपकते बेच देंगे नहीं देखते यारी।

सावधान!बचके रहना होगा राम बहादुर
जलने की होती है अदृश्य जैसी बीमारी।
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राम बहादुर राय
भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश

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