लगे रहो दिन रात तुम,सहकर के संताप
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दुनिया की यह रीति है,रोके चलती राह
घर उजाड़े बसा हुआ,झूठे करती आह।

जिसका हो बैरी नहीं, उससे सबको बैर
अगर आदमी सच्चा है,लगता सबको गैर।

पहले से मौजूद है,पूरी चादर तान
अगर तुम बढ़ना चाहो,मानेगा अपमान।

वश में तेरे नहीं है ,सबके हैं भगवान
कुछ नहीं कर सकते हो,समय ही बलवान।

कर नहीं सकते हो तुम,अपने बल पर बात
कहते हो राधेय तुम,लाते कुल की बात।

नहीं रोक सकोगे तुम,रवि को देकर हाथ
टिका कब है अंधेरा,जब सूरज हो साथ।

लगाकर बैठे कौरव,लाक्षागृह की आग
साथ केशव हैं जिसके,बुझ जायेगी आग।

राम बहादुर जानिये,चलना है चुपचाप
लगे रहो दिन रात तुम,सहकर के संताप।
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राम बहादुर राय
भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश


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