जी रहा हूं मैं बनकर के एक ज़िन्दा पीर
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मरने की मेरी जो तुम दुआ कर रहे हो
सोच लेना यह कि तुम भ्रम में जी रहे हो।

रोज मरता और जीता हूं सुबहो शाम
मारने के लिए मुझे बेमौत मर रहे हो।

ज़िन्दा देखकर मुझे इतना जो डर रहे हो
ऐ ज़ालिम तुम भूल कितनी कर रहे हो।

बन चुका हूं मैं कब का ख़ुद एक ज़नाजा
सोचो कि तुम ज़नाजे से भी डर रहे हो।

वश में रहता तुम्हारे उठा देते ज़नाजा
तंग होकर मुझे मुझे तंग कर रहे हो।

जी रहा हूं मैं बनकर के एक ज़िन्दा पीर
देखकर क़फ़न मेरा क्यूं इतरा रहे हो।

जहां मैं रहूंगा मुझे कोई दिक्कत नहीं
शायद इसी बात से तुम मात खा रहे हो।

मुझे देखकर देखते तुम चले जाओगे
हमेशा से मुझे देखकर मरे जा रहे हो।

तुम्हारी हस्ती नहीं जो मिटा दोगे मुझे
मेरे चाहने से ही तुम चल पा रहे हो।
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राम बहादुर राय
भरौली, बलिया, उत्तर प्रदेश




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