बांध सकोगे कब तक सूरज को अंधेरों से
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छोड़ दिया है आजमाना दोस्तों को मैंने
भाग जाते हैं सभी,संकट में मुझे देखकर।

घबरा से गये हैं अभी से देखकर मुझको
उड़ गयी है नींद,मेरा आगाज़ देखकर।

तुम्हारा अंदाजे बयां भी मैं समझता हूं
होश़ फ़ाख्ता हैं तेरे,खुशी मेरी देखकर।

सदियों से कहते रहे हो शोषित-वंचित मुझे
कसते हो फब्तियां अब भी तुम,मुझे देखकर।

लद गये वो ज़माने कि थे राजा बाबू तुम
वक्त है बदल जाओ इस ज़माने को देखकर।

आंकना वश में तेरे नहीं राम बहादुर को
हुनर सीख गया है वो तेरा उसूल देखकर।

तुम चल भी नहीं सकते,वह दौड़ने लगा है
तेरा कटना बता रहा है,जलते हो देखकर।

बांध सकोगे कब तक सूरज को अंधेरों से
कौन टिका है सूरज की किरणों को देखकर।

मंजूर थी तुम्हारी नाफरमानियां भी मुझे
कह देते जो कहना था मुझको तुम देखकर।

फक्कड़ राम बहादुर का क्या बिगाड़ सकोगे
जो खुद चलता है सूरज की रौशनी देखकर।
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राम बहादुर राय
भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश

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