54-नहीं अहमियत बात की,मरे हुए हैं लोग
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मित्र अब वैसे नहीं हैं,बीत गई वह बात
मिल गया मौका उसको,कर देता है घात।
आप वहां मत जाइये,जहां नहीं मन मीत
मित्र से वादी ठीक है,राखे मन में प्रीत।
दुनिया तो दुरंगी है,चलती अपनी चाल
रिश्ता उससे रखती है,रखता है जो माल।
उसे पूछता कौन है,होता अच्छा इन्सान
चोर उचक्के मौज करें,मरता रहे किसान।
धन दौलत को देखकर,हो रहा मेलजोल
छुपकर बैठा भेंड़िया,ओढ़ शेर की खोल।
युग ज़माना बदल गया,बदल गये हैं लोग
मुफ्त में सब मिल जाये,खूब करें उपभोग।
वश नहीं चलता है तो,जाति बनाता ढ़ाल
जाति धर्म के नाम पर,खूब बजाता गाल।
घूम रहे चारों तरफ,बनके दोस्त दलाल
चढ़ गये छांछ पर अगर,करेंगे तब हलाल।
जिसे मानता था अच्छा,घतइल वही हजार
चीर हरण कर मेरा,पाट दिया बाज़ार।
राम बहादुर जान लो,मतलब के हैं लोग
नहीं अहमियत बात की,मरे हुए हैं लोग।
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राम बहादुर राय
भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश
मुझसे मुकम्मल दूरियां
बनाके चलते हैं लोग।
कहीं वो मुझे बुला लिये
तो दरिया न सोख लूं!!
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राम बहादुर राय
भरौली, बलिया, उत्तरप्रदेश
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