38-मेरे ज़ख्मों से करता वह खुराफात है
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क्या बताऊं हालात मेरे कैसे हैं
कैसे कहें,कह नहीं सकते जो बात है।
बिछाये बैठे हैं जाल जो सैय्याद हैं
देखते दिन में ऐसे जैसे कि रात है।
देते हैं दुआ मेरी वो नाकामी के
भेड़िया होकर भी आदमी की जात है।
जो भी करता हूं देखता चुपचाप है
मेरे ज़ख्मों से करता वह खुराफात है।
वो समझता है सबका वही मुकद्दर है
तारे गिनने की दिन में ही आदत है।
सहते-सहते ज़ख्म पर बेअसर ज़ख्म हैं
डर होगा तुझे,हमें तो इसकी आदत है।
जान लो होती है कयामत कभी न कभी
देख लेना वहां किसकी कितनी ताक़त है।
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राम बहादुर राय
भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश
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