44-रहता हूं जमीं पर कभी मैं उड़ता ही नहीं
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इस जीवन का कभी कोई भरोसा ही नहीं
कब क्या होगा यह कोई जानता भी नहीं।
इतरा रहा था मैं सम्बन्धों पर अपने बहुत
मिला जब उससे तो हमको देखा भी नहीं।
रची थी साज़िश मुझको गिराने की उसने
हूं पहले से जमीं पर उसको पता ही नहीं।
गिरता वही है जो उड़ता है आसमां में
रहता हूं जमीं पर कभी मैं उड़ता ही नहीं।
मुझे सियासत जान के सियासत न करना
मृग मरीचिकायों से मेरा वास्ता ही नहीं।
छीन सकते ही नहीं मुकद्दर तुम किसी का
हाथ मे कुछ नहीं तेरे,तुझे पता ही नहीं।
जो मेहनतकश है वह मायूस होता नहीं
तोड़ते हैं जो पत्थर डिगा उसे सकते नहीं।
तुम्हारे चाहने से किसी का कुछ नहीं होता
तेरे उपर प्रभु हैं ये बात समझ सकते नहीं।
कैफियत तेरी अच्छी नहीं है राम बहादुर
तूं तो फक्कड़ है रख किसी से उम्मीद नही।
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राम बहादुर राय
भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश
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