47-कुलांच रहे ताड़ पर  बौने, होकर लम्बे सबसे सशक्त
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छोड़ द्रुमों  की  छाया कल्प,चले  निराकृत  हो आसक्त
तजि  देह  खड़ी  हुई  वैदेही,मानो  खड़ा  अनल  तृप्त।

फुदक  रही अशान्त  क्षुधा, शान्त  होकर मानो विरक्त
देखते  बगुले  हंस के सपने, छीनते  झख के अनुरक्त।

कुलांच रहे ताड़ पर बौने, होकर लम्बे सबसे सशक्त
होकर उदास  बैठे फ़जर, होंगें  फना  जैसे अभिशप्त।

बनकर मारीच  बैठे  मृग, कर नैतिकता  स्वयं विभक्त
चल रहा  कालखंड अदृश्य, सत्य  पस्त झूठे हैं उदत्त।

भाग्य कोस रही अपने को,अभाग  के हाथ हैं सशक्त
खेलती प्रभा निशा के घर,घात प्रतिघात का यह वक्त

लिख रहे हैं भाग्य अभागे, खड़ग शिला पर हर वक्त
मत हो उदास राम बहादुर,रहो डटे हुए बिन आशक्त।
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राम बहादुर राय
भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश

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