उम्मीद नहीं किसी से, फिर कारवां क्यों रोक लूं!
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मुकम्मल दूरियां बना के ,चलते हैं मुझसे लोग
कहीं वो मुझे बुला लिये,तो मैं दरिया न सोख लूं!!
चलना उचक्कों जैसे,कभी सिखाया न गया मुझे
चन्द लम्हों के लिए,आदत भला क्यों मैं बदल लूं।
रहता हूं किनारे पर मैं,अपने आप ही हर जगह
उन्हें डर है जगह उनकी ,आकर मैं ना रोक लूं।
मैं खुद में एक समन्दर हूं ,तुम जानते मुझे नहीं
निकलना छुप छुपाकर,कहीं तुझे मैं ना देख लूं।
सीखा नहीं है डालना, नमक किसी के ज़ख्म पर
जी रहा हूं बल पर अपने,किसी की ओट क्यों लूं।
फितरत हमारी ऐसी है कि ,रहते हम निस्पृह हैं
फिर भी सोचते हो तुम,लालच में ज़मीर तोड़ लूं।
तुम साथ रहो न रहो ,काम अपना करता रहूंगा
उम्मीद नहीं किसी से, फिर कारवां क्यों रोक लूं।
छोड़ नहीं सकता इमान,चाहे कुछ मिले न मिले
कुछ मिले या न मिले ,अब एहसान तेरा क्यों लूं।
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राम बहादुर राय
भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश
#highlightseveryone
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