Posts

आज का शहर

आज का शहर           ------------------------ आज का ये कैसा शहर है चारों तरफ जहर ही जहर है          रिश्तों की नहीं कोई कदर है          तो रहने की भी नहीं ठहर है गांव में बड़ा सा अपना घर है वहीं केवल रिश्ते की कद्र है          गांव से ही बसते तो शहर है         फिर भी कहे अच्छा शहर है रिश्तों में होता जहां जहर है शायद उसी को कहते शहर है         केवल यहां बीवी और शौहर है         बाकी रिश्ते तो यहां बे असर हैं मां- बाप की भी क्या कदर है वह अकेला ही करता बसर है         ठोकर खाते पर पीता जहर है         आधुनिकता का यही कहर है कहें शान से शहर में मेरा घर है मेरे घर आ जाये न कोई ये डर है         क्या जाने रात है कि दोपहर है         घर आये अतिथि वो भी जहर है राम बहादुर राय "अकेला" भरौली ,नरहीं ,बलिया ,उत्तर प्रदेश,  पिन कोड:२७७५०१

हमारी पहचान

पहचान हमारी ------------------- हमारी यह पहचान समझिये आंसूओं को मुस्कान समझिये                 टीस,चीख, और ज़ख्मी मंजर                 शहर को श्मशान ही समझिये मुश्किल से मिलती रोटी उनको ये है ग़रीबी की दास्तान समझिये                  करते काम तो मिलती मजदूरी                  इसको मत एहसास समझिये जो अक्सर ही हंसते रहते हैं उनके दिल सुनसान समझिये                   चुभेंगे ही रोज़ कांटे भी दिल में                    फूलों से भी नुकसान समझिये राम बहादुर राय "अकेला " भरौली, नरहीं, बलिया ,उत्तर प्रदेश, पिन कोड:२७७५०१ स्वरचित एवं मौलिक रचना सर्वाधिकार सुरक्षित

परिचय एक नज़र में:-

नाम:-राम बहादुर राय पिता:-श्री रामायण राय माता:-श्रीमती मालती देवी पत्नी:-श्रीमती आराधना राय (मनोविज्ञान में शोधार्थी) जन्म:-मजदूर दिवस 01 मई। कार्य-स्वतंत्र पत्रकारिता, कविता, कहानी, निबन्ध लेखन भूतपूर्व मानवाधिकार कार्यकर्ता (डिप्युटी चीफ़ सेक्रेटरी बलिया-एजुकेशन-अन्तर राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन),                                शिक्षक शिक्षा-दीक्षा :- शिक्षा तो नाममात्र की है पढ़ नहीं पाया अभावग्रस्त था फिर भी कुछ है --- एम.ए.:- हिन्दी साहित्य, इतिहास                          और पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा इन मानवाधिकार और कर्तव्य,(PGDHR& Duties) पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा इन जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन,(PGDJMC)                         बी.एड.(B.Ed.) पता:-ग्राम व पोस्ट -भरौली,थाना-नरहीं जनपद-बलिया, उत्तर प्रदेश, पिन कोड-277501 सीमांत कृषक पिताजी का खेती में हाथ बंटाने का कार्य शुरूवात ...

भूमिका के दो शब्द

सर्वभाषा ट्रस्ट नई दिल्ली की लोकप्रिय काव्य श्रृंखला से मैं भी जुड़ गया हूं।इस उपक्रम से अपने प्रिय पाठकों को नये तरीके से अपने उपजीव्य गांवों,शहरों, आधुनिकता के दिन प्रतिदिन बदलते आयामों को लाकर रखा हूं। यद्यपि कि ऐसा लग रहा है कि अब पूरा का पूरा परिदृश्य ही बदल गया है मानो गांव, गरीब, किसान, मजदूर सब निष्प्राण हो गये हैं और सारे देवस्थलों पर किसी का कब्जा हो गया है। चूंकि मैं शुद्ध रूप से एक दलित किसान मजदूर का गंवई कवि हृदय व्यक्ति हूं मुझे गांव अति प्रिय है। अन्दर से लगता है,सम्भावनाएं समाप्त नहीं हुई हैं अभी भी देखा जाए तो बड़े बड़े चकाचौंध वाले नगरों, महानगरों को भी संवारने का काम हमारी गंवई प्रतिभाओं ने ही किया है।यह पूर्णतया सत्य भी है कि गांव, गरीब, किसान, मजदूर ही मुख्य उर्जा है इस पवित्र देश की ,सच कहें तो यही राष्ट्र की आत्मा हैं। मेरी सामाजिक पृष्ठभूमि भी पूर्व  उत्तरप्रदेश के दो प्रमुख जिलों गाजीपुर, बलिया और उसमें भी मेरा गांव भरौली जहां महर्षि विश्वामित्र जी की पावन भूमि बक्सर का त्रिकोण है । यहां की माटी में विविध रंग भरा पड़ा है ।मेरी लिखी कविताएं ज्यादा तो अनुभव ...

आम आदमी

आज आदमी कितना उलझा है सिर्फ अपने लिए वो सुलझा है अपनी गलती दिखती नहीं उसे दूसरे का सही भी ग़लत लगता है अपने गलत करके सही कहता है हर आरोप निर्दोष पर मढ़ता है एक"अकेला"सच के लिए लड़ता है पूरा जमाना उसके पीछे पड़ता है साथ साथ बड़े ही प्रेम से रहते हैं पर वो पीछे चाकू लेकर रहते हैं एक तरफ शान्ति की बात होती है दूसरी तरफ घुसपैठ की जाती है घोषणा पत्र में जो भी बात होती है चुनाव बीता तो बीती बात होती है हर रोज उनसे मुलाकात होती है मुद्दे पर तो नहीं कभी बात होती है क्या सच है क्या ग़लत नहीं पता है क्योंकि हम स्वयं में ही उलझे हुए हैं हमें जो अच्छा है उसको वह लेते हैं दूसरे के लिए उसे बुरा हम बताते हैं ग़ज़ब की सियासतदान है आदमी  साथ रहकर ही सबको लड़ाते हैं अमन चैन कायम कर लेती जनता लेकिन सियासत आड़े आ जाती है                   ----------------- राम बहादुर राय "अकेला" अध्यक्ष भोजपुरी विकास मंच बलिया उत्तरप्रदेश

जुनून अभी कायम है

जुनून अभी कायम है- ------------------------ तूफां से भी खौफ़ नहीं है मुझे भले ही डूब ही जाऊं। कश्ती छोड़कर मैं भाग जाऊंगा यह मत समझ लेना। मैं तो ऐसे बगिया का फूल हूं जो सदाबहार पुष्पित है। मेरा जुनून अभी तक कायम है ईश्वर बेरहम नहीं है। ज़माना भले मुझे तवज्जो न दे हमें तो चलते जाना है‌। हम तो तूफां में ही पले बढ़े हुए हैं हमें उसकी आदत है। जीते जी अगर कुछ कर लिए तो कुछ हासिल हो गया। अगर हम कुछ नहीं भी कर सके तो समझो शहीद ही हुए। हम"अकेला" उस मिट्टी के बने हैं जहां बागी जन्म लेते हैं। जो भी साथ हमारे चला करते हैं वो भी कुछ कर जाते हैं। सन् 42 के आन्दोलन में देखा है सारी दुनिया बागी तेवर। ठान लिया एकबार कुछ करने को फिरंगी भी पस्त हो गये। हम सिर्फ़ अपने लिए ही नहीं जीते जीने की राह बना देते हैं। जो कुछ यहां सम्भव नहीं होता है हम सम्भव बना देते हैं। हम डूब जायेंगे यह मत सोच लेना जुनून,जोश अभी कायम है।              ----------- राम बहादुर राय "अकेला" भरौली,नरहीं, बलिया, उत्तरप्रदेश

भरोसा कायम रहे---

भरोसा कायम रहे--- ----------------------- ख्वाब जिनके ऊंचे और मस्त होंगे उनके परीक्षण भी जबरदस्त होंगे। दुश्मन हर तरफ नहीं कोई दोस्त होंगे धोखा खाते खाते वह अभ्यस्त होंगे। सामने कोई ठहरता नहीं है कभी भी षड़यंत्र में शकुनि और दुर्योधन होंगे। यदि स्वयं पे विश्वास हो कुछ करने का सिर्फ अपने लक्ष्य पर ध्यान लगाने होंगे। फिर साथ तुम्हारे केशव भी जरूर होंगे झुण्ड में तो सिर्फ गीदड़ चला करते हैं। लक्ष्य भेदने वाले"अकेला"अर्जुन ही होंगे जिधर देखो अब उधर दु:शासन ही होंगे। जैसा कर्म होगा परिणाम भी वैसे ही होंगे यदि सिंहों से पंगा लेने की जुर्रत करोगे। तो फिर उसके परिणाम भुगतने ही होंगे ख्वाब ऊंचे मस्त यदि देखने हैं पाने हैं तो। कठोर योग हमें तो अवश्य ही करने होंगे अन्यथा परिणाम हक में शायद नहीं होंगे।                   ----------------- राम बहादुर राय "अकेला" भरौली नरहीं बलिया उत्तरप्रदेश