गुजारिश ख्वाहिश मेरी पूछ लो ---------------------------------------- पल भर में ही इरादा बदल लेते हो तुझे अपना बनाने से क्या फायदा! क्यों मिलते हो,जब फुर्सत नहीं मिलती ऐसे मिलने का तुझसे क्या फायदा! सिर से पांव तक हम यूं फ़ना हो गये तेरे कारण ही हम बेपनाह हो गये! है गुजारिश कि ख्वाहिश मेरी पूछ लो वर्ना इन ख्वाहिशों का है क्या फायदा! जब तेरे साथ थे वक्त भी साथ था बिन तेरे ये वक्त भी ठहर सा गया! निकलता नहीं है दिन में सूरज मेरा रात को तारे गिनने से क्या फायदा! तुम से ही अंधेरों में थी रोशनी तुम नहीं तो ये दीपक भी ओझल हुए! मेरी क्या थी खता कि बदल तुम गये मैं न बदला, इससे है क्या फायदा! जिंदगी है मेरी, बुलबुला पानी का कब उठी,कब फूटी मुझे पता ही नहीं! मैं जिंदा हूं तो सिर्फ़ तेरी अज़मत लिए वर्ना,इस जीवन से है क्या फायदा! इस तरह से मुझमें अंकशायी हुए मेरे दिल में अब कोई जगह ही नहीं! तेरे इरादे बदलने का कुछ गम नहीं बिन तेरे किसी से है क्या फायदा! ------------------ राम बहादुर राय भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश
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देखना तुम दिया तले ,वह अंधेरा कितना है! -------------------------------------- दिल को दरिया बताने वाले बहुत हैं आजकल वक्त बता देता है इनका हौसला कितना है। बुझा के दिया कहते हैं दिया जला दिया हमने डर जाते हैं ये लोग देखो दिल बड़ा कितना है। बनते हैं भरी महफिल में लगते हैं तुर्रम खान डर तिनके से भी है देखो हौसला कितना है। झपट पड़ते हैं किसी पर जिसे समझते यतीम सताते हैं सताये को आदमी बड़ा कितना है। करते हैं वार चुपचाप झुण्ड बनाकर के कायर सोचो मन में इनके भरा ज़हरे खौफ़ कितना है। लगाकर के तोहमतों का अम्बार राम बहादुर कहते फिरते हैं आदमी यह अच्छा कितना है। दोष इनका नहीं है दोष इनकी फितरत का है राह में पत्थर रखते हैं सोच अच्छा कितना है। जो भी करना होगा वह सरेआम तुम ही करना देखना हर आदमी का मिलता दुआ कितना है। दिया जलाना - बुझाना हाथ में नहीं है तुम्हारे देखना तुम दिया तले, वह अंधेरा कितना है। -------------------- राम बहादुर राय भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश #highlightseveryone
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तुम समझते हो तुम पर कोई नजर ही नहीं -------------------------------------- तुम समझते हो तुम पर कोई नज़र ही नहीं ये नज़र तुम्ही पर तो है खबर तुम्हे ही नहीं। करती होगी दुनिया बहुत इज्जत तुम्हारी लेकिन घर में तुम्हारी तो इज्जत ही नहीं। बातों के असर का होता बहुतों पर असर मगर तेरे अपनों पर कोई असर ही नहीं। कमियां होती हैं हर आदमी में कुछ न कुछ आदमी,आदमी है कोई ख़ुदा तो नहीं। हर एक आदमी में है एक अलग आदमी क्या करे ना करे कोई बन्धन तो नहीं। सच जो भी हो स्वीकार करना ही चाहिए सच तो सच होता है वह बदलता तो नहीं। काट कर गला किसी का मन्दिर में जाने से किया है जो पाप वह कभी धुलता तो नहीं। होती है मुकर्रर सजा हर एक बुरे कर्मों की करेंगे गलत काम वह बच सकते तो नहीं। लगे रहो तुम राम बहादुर सच्ची लगन से देर होगी पर भंवर रोक सकती तो नहीं। --------------- राम बहादुर राय भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश #highlightseveryone
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#आजकल तृप्त करो तृष्णा मेरी,हर लो मेरी पीर पानी पानी हो गये,पानी मिला न तीर। उपर से दिखाते प्यार,मन में रखते रार देते नहीं साथ कभी,नफरत के भंडार। सुखी तुमको रहना है,बांटो जग में प्यार प्यारा यह संसार है,खूब करो तुम प्यार। मुख मलीन करते रहें,मन से बनें कुलीन जो कुलीन हृदय से है,होते नहीं मलीन। भाव स्वभाव साफ हो,रखो नहीं मनभेद साफ मन से काम करो,चाहे हो मतभेद। नहीं गरीब है कोई,नहीं कोई अमीर सच में वही अमीर है,जिन्दा जिसका जमीर। करते बात आदर्श की,हांकते लम्बी डींग हंसी उड़ाते सबकी,खुद गदहे की सींग। राम बहादुर जानिए,सब हैं एक समान सम्मान नहीं कर सकते,मत करना अपमान। --------------------- राम बहादुर राय भरौली,बलिया,उत्तर #highlightseveryone
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जब से हम चलने लगे हैं वे जलने हमसे लगे हैं मन में शंका पहले जो थी वही वे करने लगे हैं। रह रहे हैं अंधेरों में हम जैसे यहां के सब लोग बड़े आराम से माखौल सबका उड़ाने में लगे हैं। वो जानते हैं कि कायम रहेगी बादशाहत हरदम शोषित हैं जो यहां पर उसे वंचित करने में लगे हैं। कोई कमजोर है यह समझने की भूल नहीं करना ऐसा कर वक्त अपना लोग जाया करने में लगे हैं। चाहते हो तुम कि कायम रहेगा अंधियारा हरदम वो अंधियारों से दीप प्रज्ज्वलित करने में लगे हैं। दुनिया बदल गई लेकिन तुम तो वहीं पर खड़े हो जिसे तुम गिराने में लगे हो वे उठाने में लगे हैं। बुझे हुए ज़ख्म क्यूं कुरेद रहे हो तुम राम बहादुर वह तो यहां पर ज़ख्मों का मरहम बनाने में लगे हैं। बिक गये सारे हाथी और खत्म हो गये प्रिवी पर्स लेकिन अभी भी वे लोग पुराने दिखावे में लगे हैं। बिक रहे हैं अब भी बाग बागीचे और आशियाने बिक रहा है तेरा सब और वो खरीदने में लगे हैं। अब भी हज़म नहीं हो रहे इनको हमारे जैसे लोग हाथ बढ़ाने के बदले वह टांग खींचने में लगे हैं। ---------------- राम बहादुर राय भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश #highlightseveryone
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मेरे शुष्क सज़ल नयन में तुम -------------------------- मेरे अन्तस में बसे हो तुम, ध्यान से अन्तर्ध्यान, जहां भी देखूं तुम ही तुम हो तुम्हें लगता है कि तुम ही हो, तो देख अपना अक्स, मेरे तो अक्स भी हो तुम्ही हो मेरे ख्वाब ख्याल में बसे तुम, संधान या परिधान, मेरे लिए संस्कृति हो तुम! मेरे कंठ उर के सृजन तुम, मोह कहो या विछोह, प्रेम के अमृत स्रोत तुम्ही हो ! मेरे शुष्क सजल नयन में तुम, झील कहो या सागर, मेरे नयनाभिराम हो तुम! अनचाहे मेरे चाह हो तुम, इकरार व इंतजार, मेरे जीवन के संसार तुम! रेगिस्तान में ओसिस तुम्ही हो, मूल कहो या क्षेपक, मेरी दुनिया जहान हो तुम! मेरे अतुलित आधार भी तुम, मूक रहूं या वाचाल, मेरे जीवन की पतवार तुम! मेरे तिमिर तम के उजास तुम, निर्गुण कहो या सगुण, जीवन के एहसास हो तुम! -------------- राम बहादुर राय भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश
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पहिले से ढ़ेर छिछोरा हो गइल बा आदमी -------------------------------------- एक दूसरा के गलती देख रहल बा आदमी छेद के आपन छत से सहेज रहल बा आदमी। घूम रहल बाटे बेल पर उहो कुछे दिन खातिर जेल में अनका के फंसा रहल बा अब आदमी। आगे बढ़ि गइल बाटे अवकात से ढ़ेर अपने गिरावे खातिर के खेला कर रहल बा आदमी। कहेला लोग कि बदल गइल बाटे ई जमाना पहिले से ढ़ेर छिछोरा हो गइल बा आदमी। जहंवा देखऽ जात जाति खूब चल रहल बाटे अनका के छिमानू अब कर रहल बा आदमी। एंड़ी से कपार तक भरल बाटे जहर सांप के मुंह धइके गरदन खूब काट रहल बा आदमी। के आपन के आन हऽ बन गइल बाटे पहेली ज़हरे में मिला के मधु बांट रहल बा आदमी। बोलबऽ कुछवू तऽ बात बिगड़ी राम बहादुर सावधान! आदमी के काट रहल बा आदमी। आगे बढ़े के बाटे तऽ चुपचाप रहल जाला जे आदमी नइखे उहो बन रहल बा आदमी। ई मति जनिहऽ लगाव तोहरा से केहू के बा करे खातिर जबह खूब चढ़ा रहल बा आदमी। ------------------ राम बहादुर राय भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश
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होई गइल बाड़े अदिमी अब तऽ समसान हो -------------------------------------- तोहरे कारनवा भइनी बन के फिफिहिया हम छूटि गइल हमरो अब तऽ जिये के आधार हो। संगी संहाति छूटल गॉंव घर के थाती छूटल अरे छूटि गइल आमवा महुइया के बाग हो। छूटि गइल......... माई बाबू छूटि गइलन खेत खरिहान छूटल अरे छूटि गइले ममता के हमरो बागान हो। छूटि गइल........ दूई कोठरी के चोंचला में गुजर करत बानी बूझि नाहीं पाइले कब होखे रात बिहान हो। छूटि गइल ....... नइखे पूछवइया केहू मुवलऽ की जियलऽ तूं होई गइल बाड़े अदिमी अब तऽ समसान हो। छूटि गइल..... केतनो हम जरीं मरीं साख तोहार भरे नाहीं तबो कहेलू बानी हम जीव के जंजाल हो। छूटि गइल........... कहे राम बहादुर सुनऽ नइखऽ अकेले तूहीं बाटे चलल अब तऽ दुनिया में इहे रिवाज हो। छूटि गइल........ ------------------- राम बहादुर राय भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश
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बांध सकोगे कब तक सूरज को अंधेरों से ------------------------------------ छोड़ दिया है आजमाना दोस्तों को मैंने भाग जाते हैं सभी,संकट में मुझे देखकर। घबरा से गये हैं अभी से देखकर मुझको उड़ गयी है नींद,मेरा आगाज़ देखकर। तुम्हारा अंदाजे बयां भी मैं समझता हूं होश़ फ़ाख्ता हैं तेरे,खुशी मेरी देखकर। सदियों से कहते रहे हो शोषित-वंचित मुझे कसते हो फब्तियां अब भी तुम,मुझे देखकर। लद गये वो ज़माने कि थे राजा बाबू तुम वक्त है बदल जाओ इस ज़माने को देखकर। आंकना वश में तेरे नहीं राम बहादुर को हुनर सीख गया है वो तेरा उसूल देखकर। तुम चल भी नहीं सकते,वह दौड़ने लगा है तेरा कटना बता रहा है,जलते हो देखकर। बांध सकोगे कब तक सूरज को अंधेरों से कौन टिका है सूरज की किरणों को देखकर। मंजूर थी तुम्हारी नाफरमानियां भी मुझे कह देते जो कहना था मुझको तुम देखकर। फक्कड़ राम बहादुर का क्या बिगाड़ सकोगे जो खुद चलता है सूरज की रौशनी देखकर। ----------------- राम बहादुर राय भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश
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लगे रहो दिन रात तुम,सहकर के संताप ----------------------------------- दुनिया की यह रीति है,रोके चलती राह घर उजाड़े बसा हुआ,झूठे करती आह। जिसका हो बैरी नहीं, उससे सबको बैर अगर आदमी सच्चा है,लगता सबको गैर। पहले से मौजूद है,पूरी चादर तान अगर तुम बढ़ना चाहो,मानेगा अपमान। वश में तेरे नहीं है ,सबके हैं भगवान कुछ नहीं कर सकते हो,समय ही बलवान। कर नहीं सकते हो तुम,अपने बल पर बात कहते हो राधेय तुम,लाते कुल की बात। नहीं रोक सकोगे तुम,रवि को देकर हाथ टिका कब है अंधेरा,जब सूरज हो साथ। लगाकर बैठे कौरव,लाक्षागृह की आग साथ केशव हैं जिसके,बुझ जायेगी आग। राम बहादुर जानिये,चलना है चुपचाप लगे रहो दिन रात तुम,सहकर के संताप। ---------------- राम बहादुर राय भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश
समय पर काम न आये वो यार नहीं होते
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समय पर काम न आये वो यार नहीं होते ------------------------------------ तलबगार बने हैं जो मददगार नहीं होते समय पर काम न आये वह यार नहीं होते। जिंदगी की जद्दोजहद में देखा है हमने जो होना है उस पर अख्तियार नहीं होते। हर इल्म का आइना हाथों में है अपने लगा लेने से क्रीम चेहरे साफ नहीं होते। सोच समझकर बोलना भाई राम बहादुर चलाये बाण और शब्द वापस नहीं होते। वक्त सबका आता है एक दिन ऐ साहब किये गये सार्थक प्रयास बेकार नहीं होते। भ्रम दूर करो सिकन्दर से डर जायेंगें हम कोई सिकन्दर हमसे यहां पार नहीं होते। अभी तो सीख रहे हैं कलम चलाने हम चुप रहते हैं जो कभी कमजोर नहीं होते। शापित कर्ण को तो मार पाओगे धोखे से छल से जीतने वाले कभी वीर नहीं होते। --------------- राम बहादुर राय भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश
बिका रहल बा आदमी बेकहल जज्बात पर
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बिका रहल बा आदमी,बेकहल जज्बात पर ------------------------------------- चल रहल बाटे जिनगी,अनका अंजोर पर आपन वजूद नइखे,बा अनका जोर पर। अवकात देखा देलन,तनि तनि से बात में देखे से नीक बाड़न,अड़कसु ना बात पर। बात करबऽ उनका से,धौंस देखावेलन जेकर उधार जिनगी,चलता सेंगरा पर। चलावसु हिटलरसाही,मिले केहू उनसे खानदान बघारेलन,हर बात के बात पर। लिखे के नीक लिखेलन,संपादन करेलन कुछ पूछि देबऽ उनसे,आ जालें जात पर। देखिके पउवा भारी,सम्बन्ध बनावेलन सुनेलन राम बहादुर ,ताना हर बात पर। रेखा खीचले बाड़न,राखबि केकरा के केतनो रहबऽ नीमन,छांट देब जात पर। कहेलन राम बहादुर,पाकले आम बाड़ऽ केतना दिन अलगइबऽ,बाड़ऽ तूं छांछ पर। पहिलहूं से रहल बा,अबो नइखे छूटल बिका रहल बा आदमी,बेकहल जज्बात पर -------------- राम बहादुर राय भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश
कलयुग में कान्हा कपटी कंस कराल बा
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कलयुग में कान्हा कपटी कंस कराल बा अनेकन कंस के मुंह भइल बिकराल बा। कागासुर बकासुर बानिंजा हमनिये के पुतना उतना के भरल पुरल परिवार बा। गीता भगवदगीता के पाठ सब करता पढ़ लिख के मनवा भइल महाभारत बा। संकट में धर्मसंकट अचरज में हो गइलें शकुनी दु:सासन से पटल अब गॉंव बा। राष्ट्र धृतराष्ट्रन से अब तरई छवाई गइल द्रोण भीषम करन के योग मंत्र कहां बा। कान्ह जनमलऽ माधव से छलिया बनऽ सब केहू एहघरी बनल भगवाने बा। मामा शकुनि कंस महाभारत करवलस घर घरे में शकुनि जरासंध से भरल बा। जातिवाद क्षेत्रवाद अब तऽ चरम पर बा जातिये से तऽ भइया योग्यता भरल बा। आवऽ केशव बरबरिक के जियावऽ अब इहंवा डेगे डेग महाभारत हो रहल बा। मारा मारी लुटहंस इहंवा खूबे मचल बा राम बहादुर के बस कान्हा के अलम बा। -------------- राम बहादुर राय भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश।
जो दिखता भरा वह खाली है
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जो दिखता भरा वह खाली है ------------------------- दुनिया ये कैसी निराली है जो दिखता भरा वह खाली है। अजब-गजब होते कारनामे जो असली है वही जाली है। मौज उड़ाते साली के संग कहता है गलत घरवाली है। करता काम यहां दूसरा है बनता और कोई माली है। कहता है बहुत प्रदूषण है जलाता स्वयं ही पराली है। बैठकर झूठ की गंठरी पर दे रहा सच को वह गाली है। गरीबी उन्मूलन के नाम पर छीनता गरीब की थाली है। बहुरेंगे कब हमारे भी दिन पूछ दो तो कहें बवाली है। -------- राम बहादुर राय
वीर तभी धनंजय हैं जब हों माधव साथ
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वीर तभी धनंजय हैं,जब हों माधव साथ ----------------------------------- बोली तो अनमोल है,बोलना अच्छे बोल नहीं बोल सकते अच्छे,ज़हर तूं मत घोल। चल रही है होड़ यहां, है किसका प्रताप रखते थे हाथी सभी,मुंह से बनते बाप। होते हैं दरिद्र लोग,करे बड़ाई आप दो पैसे जब आ गये,देते सबको नाप। बड़ा मतलब होता है,रहो धीर गंभीर लेता काम संयम से,होता नहीं अधीर। देखोगे उस पेंड़ को,आता सबके काम झुक जाता है अदब से,नहीं बताता नाम। दुनिया तो दिखावा है,पूजती लम्बी बांह जो होता कमजोर है,देती नहीं पनाह। मत पालना भ्रम कभी,हो सबसे तुम वीर पता चलेगी अवकात,उठा कभी शमशीर। वीर तभी धनंजय हैं,जब हों माधव साथ लड़कर अकेले देखना,उड़ जायेगा माथ। ----------------- राम बहादुर राय भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश
बैठे हैं जाल बिछाये चारों तरफ शिकारी
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बैठे हैं जाल बिछाये चारों तरफ शिकारी कौन फंसाये कितना कर रहे मारा मारी। जिसे देखते मालधनी माया वहीं फैलाते बनकर मासूम लोगों को लेते छीन क्यारी। पिला देते हैं ज़हर को बताके शहद मीठा समझ नहीं पाता है कोई इनकी अय्यारी। रोते हैं घर में अपने मृदंग बजाते बाहर प्रेम सुधा बरसाकर चला देते हैं आरी। करते हैं बात ऐसे जैसे हों महाज्ञानी बढ़ता देख किसी को चलाते छुरी कटारी। वक्त के हिसाब से बदलते रहते हैं चोला प्यार जतायें जिसपे नुकसान करेंगे भारी। दिखावे का रहता है चेहरा मासूम इनका पलक झपकते बेच देंगे नहीं देखते यारी। सावधान!बचके रहना होगा राम बहादुर जलने की होती है अदृश्य जैसी बीमारी। -------------- राम बहादुर राय भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश
निश्छल प्रेम मिलता है आज भी गॉंवों में
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निश्छल प्रेम मिलता है आज भी गॉंवों में ------------------------------------ हम तो रहते हैं गॉंव की गलियों गलियों में झरती खुशबू डाली डाली और कलियों में। पक्षी करते कलरव भौंरे गुनगुन गाते हैं जहां सुनाती लोरी नदियां गॉंवों गॉंवों में। रुनझुन से पशुओं के होता रोज सबेरा जहां हैं रहते पूर्वज पीपल के पेड़ों में। राग सुनाती कोयल काग देता शुभ सन्देश रिश्तों से भरा है मोती इस भारत देश में। दुख कभी आ जाये तो लेते हैं लोग बांट निश्छल प्रेम मिलता है आज भी गॉंवों में। होता है महादानी गॉंवों का हर किसान निस्पृह भाव से सेवा देता है गॉंवों में। लट बनाकर झूलती हैं सुनहरी बालियां कभी देखो उलझे प्रेम धान के खेतों में। बेकार समझते हैं जिसे दुनिया के लोग बिखरे हैं तरबूज हमारे रेगिस्तानों में। हीरे मोती पर ममता मां की भारी है होता है धरती पर स्वर्ग मां के आंचल में। नहीं खरीद सकते हो धन दौलत से सुख बहती हैं नदियां सुख की आ जाना गॉंव में। -------------- राम बहादुर राय भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश #highlight
मरते देखता हूं पल पल में सच को यहां
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मरते देखता हूं पल पल में सच को यहां! ---------------------------------- तेरी अकूत दौलत से मुझे क्या लेना अपनी कमाई हुई दौलत ही काफी है! मैं तुम्हारी सेज क्यों सजाऊंगा भला ये पूरा शहर ही सेज है मेरे लिए है! तेरे आशियाने से मुझे नहीं है मतलब ये तपिश ही आशियाना है मेरे लिए! फेंके गये टुकड़ों पर नहीं है पलना मुझे ये धरती आसमान ही है मेरे लिए ! भूख लगती तो खा लेता हूं सूखे पत्ते ये पत्ते मेरी भूख मिटाने के लिए है! उसका हो जाता हूं जो चाहता है मुझे चाहत में बिक जाना ही मेरे लिए है! सच लिखना हलाहल विष पीने जैसा है विष सच का पीना भी मेरे ही लिए है! नहीं साथ दिया भाग्य ने तो क्या करता भाग्य मेरा अब लिखने के लिए ही है! मरते देखता हूं पल-पल में सच को यहां मेरा जीवन सच लिखने के लिए ही है! -------------------- राम बहादुर राय भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश #highlight
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भारत में क्रान्ति की जब धधक उठी थी ज्वाला ----------------------------------------- बिखर गई होगी हर मंजिल ध्वस्त हुई होंगी राहें देखा होगा हिन्द ने जब पुत्रों को भरते आहें! करने लगे फिरंगी थे जब धार्मिक अत्याचार क्रांति का बीज था बोया मंगल ने गोरों को मार! पीठ पे ले कर भविष्य को सर पर कफ़न को बांध बैठ मनु बादल पर अरि से युद्ध रही थी नाध! वीर कुंवर सिंह ने ललकारा होगा जब दुश्मन को त्याग दिया होगा कैसे अपने तन मन को धन को! फूट डालकर राज करो अपनाई थी नीति बंग भंग कर तोड़ी अरि ने हिंदू मुस्लिम प्रीति! टूट गई थीं तब मर्यादा की सारी ही सीमाएं ख़ून से लतपथ हुई थी भारत मां की चार दिशाएं! महर्षि,बंकिम,बनर्जी की कलम चली होगी तब खौला होगा ख़ून हिन्द का वंदे मां कहकर जब! कर डाली होगी गोरों के शीर्ष सिंहासन की वृहद समीक्षा मात दिया था सत्येद्र ने जब देकर सिविल परीक्षा! जिससे कांपते रहते गोरे ऐसा था आज़ाद डायर ऊधम के आगे दम तोड़ गया जल्लाद! मिलकर लड़े थे हिंदू मुस्लिम बिस्मिल और अशफ़ाक़ और सुभाष की अपनी सेना जय हिंद आजाद! चापेकर,चाकी,बाघा और जतिन भी कैसे होंगे जान बचाए जिनसे फिरते रहे फिरंगी हों...
नहीं कोई अपना इस ज़माने में
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नहीं कोई अपना इस ज़माने में ---------------------------- कट गये दिन बुरे मेरे सवालों में ढूंढते रहे जिन्हें हम किताबों में। क्या पता वक्त देगा धोखा मुझे जी रहे थे जिस वक्त को ख्वाबों में है कोई पहेली कि है मंजर बुरा चलाया खंजर अपनों ने जज्बातों में। फिर भी किया गुनाह उनका मैं क्षमा ले लिया है उसे अपने खाते में। बात दिल की करें तो करें किससे टूट गया दिल अब विश्वासघातों में बात को कह दिया होता बातों में नहीं फंसना हमें झंझावातों में। हो गया है लोमड़ी अब आदमी लगा है दूसरे को फंसाने में। बच के रहना तुम ऐ राम बहादुर नहीं कोई अपना इस ज़माने में ------------ राम बहादुर राय भरौली,बलिया,उत्तर प्रदेश #highlight